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लोकसभा में One Nation, One Election विधेयक पेश, Congress समेत विपक्षी दलों ने किया विरोध

लोकसभा में वन नेशन वन इलेक्शन विधेयक पेश किए जाने के बाद कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने इस पर हमला बोला. विपक्ष ने कहा कि यह प्रस्ताव ‘लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए है.’

Parliament of India

संसद भवन.

One Nation One Election bill tabled in Lok Sabha: कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मंगलवार (17 दिसंबर) को लोकसभा में वन नेशन, वन इलेक्शन बिल पेश कर दिया. हालांकि कांग्रेस (Congress) समेत विपक्षी दलों (Opposition) ने इसका विरोध किया है. कांग्रेस के मनीष तिवारी, समाजवादी पार्टी (SP) के धर्मेंद्र यादव और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कल्याण बनर्जी ने इस पर हमला बोला.

मनीष तिवारी ने प्रस्ताव को ‘इस सदन की विधायी क्षमता से परे’ बताते हुए इसकी आलोचना की और मांग की कि इसे ‘तुरंत वापस लिया जाए’, जबकि धर्मेंद्र यादव ने सदन को चेतावनी दी, ‘यह तानाशाही का रास्ता है.’ कल्याण बनर्जी ने कहा कि यह विधेयक राज्य विधानसभाओं की स्वतंत्रता को खत्म करने की कोशिश करेगा.

कानून मंत्री ने क्या कहा


कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मंगलवार दोपहर लोकसभा में कहा कि केंद्र और राज्य चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ चुनाव सुधार का एक लंबित हिस्सा है और इससे संविधान को कोई नुकसान या छेड़छाड़ नहीं होगी. मेघवाल ने कहा, ‘चुनावी सुधारों के लिए कानून बनाए जा सकते हैं. यह विधेयक चुनावी प्रक्रिया को आसान बनाने से जुड़ा है, जिसे समन्वित किया जाएगा. इस विधेयक के माध्यम से संविधान को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा. संविधान के मूल ढांचे के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी.’

मेघवाल ने यह भी बताया कि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति, जिसे ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ प्रस्ताव को वास्तविकता बनाने के तरीकों की सिफारिश करने का काम सौंपा गया था, ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने से पहले विभिन्न विपक्षी दलों सहित कई हितधारकों से परामर्श किया था. उन्होंने जोर देकर कहा, ‘हम राज्यों की शक्तियों के साथ छेड़छाड़ नहीं कर रहे हैं’, जिसके बाद उन्होंने प्रस्ताव दिया कि विधेयक को व्यापक परामर्श के लिए – जैसा कि अपेक्षित था – एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा जाना चाहिए.’

संविधान संशोधन विधेयक

मेघवाल के बचाव के बाद, विधेयक को पेश करने के लिए मत विभाजन की मांग की गई, जिस पर अध्यक्ष ने सहमति व्यक्त की; यह पहली बार था जब लोकसभा ने संविधान संशोधन विधेयक को पेश करने के लिए मत विभाजन कराया. 269 सांसदों ने इसके पक्ष में और 198 ने इसके खिलाफ मतदान किया, जिसके बाद विधेयक पेश किया गया.

विपक्ष ने किया विरोध

कानून मंत्री की प्रतिक्रिया, विधेयक के पेश होने के बाद विपक्ष की ओर से उग्र प्रतिक्रिया के बाद आई, जिसमें केंद्र और राज्य के चुनावों को एक साथ करने की अनुमति देने के लिए संविधान में संशोधन करने का प्रयास किया गया है. संविधान (129वां संशोधन) विधेयक को ‘सदन की विधायी क्षमता से परे’, ‘तानाशाही का मार्ग’ और भारतीय गणराज्य की संघीय प्रकृति पर हमला बताते हुए तुरंत आलोचना की गई.

विधेयक पेश किए जाने से पहले सरकार और विपक्ष के बीच फिर से टकराव देखने को मिला. केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि कांग्रेस के पास ‘उचित तर्क’ का अभाव है, जबकि विपक्ष ने कहा कि यह प्रस्ताव ‘लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए है.’ सदन में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी समाजवादी पार्टी ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया.

संविधान के सिद्धांतों का उल्लंघन


कांग्रेस के चंडीगढ़ सांसद मनीष तिवारी ने विपक्ष का नेतृत्व करते हुए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के मुद्दे को संविधान के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया. तिवारी ने अपनी पार्टी की तीन आपत्तियों में से पहली को रेखांकित करते हुए कहा, ‘‘संविधान का अनुच्छेद 1 कहता है कि ‘इंडिया, अर्थात भारत, राज्यों का संघ होगा, जो अपने संघीय चरित्र की पुष्टि करेगा.’ यह विधेयक, जो एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव करता है, राज्यों में एकरूपता लागू करके इस ढांचे को सीधे चुनौती देता है.’’

इन दलों ने जताया विरोध


सपा के धर्मेंद्र यादव, TMC के कल्याण बनर्जी और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के टीआर बालू ने भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी. यादव ने चेतावनी दी, ‘यह तानाशाही का रास्ता है’ और बनर्जी ने कहा कि यह ‘संविधान के मूल ढांचे पर प्रहार करता है’. श्री बालू ने एक साथ चुनाव कराने के खर्च पर चिंता जताई, जिसमें चुनाव आयोग को हर 15 साल में नई इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) पर 10,000 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना और राज्य में उसकी सहयोगी शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) ने भी अपना विरोध जताया. शिवसेना (यूबीटी) ने विधेयक को ‘संघवाद पर हमला’ बताया, जबकि सुप्रिया सुले ने पहले की आलोचनाओं को दोहराया. एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि संविधान में प्रस्तावित बदलाव राज्यों के स्वशासन के अधिकार का उल्लंघन करेंगे. ओवैसी ने यह भी तर्क दिया, जैसा कि अन्य विपक्षी नेताओं ने कहा है, कि एक साथ चुनाव कराने से क्षेत्रीय दलों का अंत हो जाएगा.

बीजेपी को इन दलों का साथ

भाजपा के दो सहयोगी दलों – आंध्र प्रदेश की सत्तारूढ़ तेलुगू देशम पार्टी और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के शिवसेना गुट – ने विधेयक का समर्थन किया. टीडीपी के लावु श्रीकृष्ण देवरायलु ने ‘अटूट समर्थन’ व्यक्त करते हुए कहा, ‘हमने आंध्र प्रदेश में देखा है कि जब एक साथ चुनाव होते हैं… तो प्रक्रिया और शासन की स्पष्टता होती है. यह हमारा अनुभव रहा है और हम चाहते हैं कि यह पूरे देश में हो.’

Lok Sabha Speaker

टीडीपी के पास 16 लोकसभा सांसद हैं, जो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड के 12 सांसदों के साथ मिलकर अप्रैल-जून के चुनाव में भाजपा को बहुमत का आंकड़ा पार करने में महत्वपूर्ण थे. साथ ही आंध्र प्रदेश उन 4 राज्यों में से एक था, जिन्होंने इस साल लोकसभा के लिए मतदान के साथ ही विधानसभा चुनाव भी कराए. अन्य तीन सिक्किम, ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश थे.

JPC को भेजे जाने की संभावना

बहरहाल विधेयक को आगे के परामर्श के लिए अगर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा जाता है तो सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते, भाजपा गठित होने वाली समिति की अध्यक्षता करेगी और उसे अधिकतम सीटें भी मिलेंगी. समिति के सदस्यों की घोषणा दिन के अंत तक की जाएगी. सूत्रों ने बताया कि शुरुआती कार्यकाल 90 दिन का होगा, लेकिन इसे बढ़ाया भी जा सकता है. सरकार ने सुबह की कार्यवाही की शुरुआत वन नेशन वन इलेक्शन प्रस्ताव के पक्ष में तर्क देते हुए की और कहा, ‘भारत का लोकतंत्र चुनावों की जीवंतता पर पनपता है और खंडित तथा लगातार चुनावों ने अधिक कुशल प्रणाली के लिए चर्चा को बढ़ावा दिया है.’

कैबिनेट ने दो विधेयकों को दी थी मंजूरी

पिछले हफ्ते केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संविधान में संशोधन करने और सत्तारूढ़ भाजपा को उसके ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ प्रस्ताव को लागू करने की अनुमति देने के लिए दो विधेयकों को मंजूरी दे दी. इन विधेयकों और संशोधनों की सिफारिश पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति ने की थी, जिसमें गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल थे. सितंबर में दाखिल की गई रिपोर्ट में इन विधेयकों और संशोधनों की सिफारिश की गई थी.

प्रस्ताव में क्या है


पहले संशोधन में राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को लोकसभा से जोड़ने का प्रावधान है; इसका मतलब है कि 2029 के बाद निर्वाचित राज्य सरकारों का कार्यकाल उस लोकसभा के कार्यकाल के साथ समाप्त हो जाएगा, इसलिए 2031 में निर्वाचित विधानसभा 2034 में भंग हो जाएगी और अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी, इसलिए इसका अगला चुनाव चक्र 20वीं लोकसभा के चुनाव के साथ समन्वयित किया जा सकता है. दूसरे संशोधन में पुदुचेरी, दिल्ली और जम्मू कश्मीर के केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं में बदलाव का प्रस्ताव है, ताकि उन्हें राज्यों और लोकसभा के साथ जोड़ा जा सके.

रामनाथ कोविंद समिति का क्या है मानना

इन प्रावधानों के 2034 के चुनाव से पहले लागू होने की उम्मीद नहीं है; विधेयक के अनुसार, इसे एक ‘नियत’ तिथि के बाद लागू किया जाएगा – जिसे नवनिर्वाचित लोकसभा की पहली बैठक के बाद अधिसूचित किया जाएगा. फिर, अगर कोई विधानसभा निर्धारित समय से पहले भंग हो जाती है, तो पिछले कार्यकाल को पूरा करने के लिए एक नई विधानसभा के लिए मध्यावधि चुनाव आयोजित किए जाएंगे.

रामनाथ कोविंद समिति का मानना ​​है कि इन विधेयकों को राज्यों द्वारा अनुमोदन की जरूरत नहीं होगी, जिससे गैर-पार्टी शासित राज्यों के विरोध के कारण भाजपा के लिए यह मुश्किल हो जाता. हालांकि, एक समान मतदाता सूची या स्थानीय निकाय चुनावों को राज्य और केंद्र स्तर पर होने वाले चुनावों के साथ जोड़ने के प्रस्तावों को कम से कम आधे राज्यों की मंजूरी की आवश्यकता होगी.

-भारत एक्सप्रेस



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