Supreme Court Criticism: देश के कई रिटायर्ड जजों ने सुप्रीम कोर्ट और खासतौर पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया पर चल रहे अभियान को लेकर कड़ा विरोध जताया है. उनका कहना है कि हाल ही में रोहिंग्या प्रवासियों से जुड़े मामले में कोर्ट की कार्यवाही को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. 5 दिसंबर 2025 को लिखे गए खुले पत्र के बाद से चीफ जस्टिस पर व्यक्तिगत हमले किए जा रहे हैं, जो न्यायपालिका को कमजोर करने की कोशिश है.
कोर्ट की टिप्पणी का असली मतलब
पूर्व जजों ने साफ किया कि चीफ जस्टिस ने सिर्फ एक बुनियादी कानूनी सवाल पूछा था “कानून के तहत किसने वह दर्जा दिया है, जिसका दावा कोर्ट में किया जा रहा है?” किसी भी अधिकार या हक पर फैसला लेने से पहले यह सवाल जरूरी है. साथ ही, बेंच ने यह भी स्पष्ट किया था कि भारत की जमीन पर कोई भी व्यक्ति, चाहे नागरिक हो या विदेशी, उसे कभी भी यातना, गायब करने या अमानवीय व्यवहार का सामना नहीं करना चाहिए. इस हिस्से को दबाकर कोर्ट पर “dehumanisation” का आरोप लगाना सरासर गलत है.
रोहिंग्या और भारतीय कानून
जजों ने कुछ अहम कानूनी तथ्य भी दोहराए-
- रोहिंग्या भारत में शरणार्थी कानून के तहत नहीं आए हैं. उनका प्रवेश ज्यादातर अवैध है और वे खुद को सिर्फ दावा करके “refugee” नहीं बना सकते.
- भारत 1951 के UN Refugee Convention और 1967 के प्रोटोकॉल का हिस्सा नहीं है. हमारी जिम्मेदारियां संविधान और घरेलू कानूनों से तय होती हैं.
- चिंता की बात यह है कि अवैध रूप से आए लोगों के पास आधार कार्ड, राशन कार्ड जैसे दस्तावेज कैसे पहुंचे. यह हमारे पहचान और कल्याण तंत्र की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है.
SIT की मांग
पूर्व जजों ने सुझाव दिया कि कोर्ट की निगरानी में एक विशेष जांच दल (SIT) बनाया जाए. यह SIT जांच करे कि अवैध प्रवासियों को भारतीय दस्तावेज कैसे मिले, इसमें कौन अधिकारी या बिचौलिए शामिल थे और क्या कोई संगठित नेटवर्क इस प्रक्रिया का फायदा उठा रहा है.
म्यांमार की पृष्ठभूमि
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि म्यांमार में रोहिंग्या को लंबे समय से अवैध प्रवासी माना जाता है और उनकी नागरिकता विवादित रही है. यही वजह है कि भारतीय अदालतों को कानूनी श्रेणियों और तथ्यों पर ही ध्यान देना चाहिए, न कि राजनीतिक नारों पर ध्यान देना चाहिए.
न्यायपालिका की भूमिका
पूर्व जजों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के दायरे में रहकर ही काम किया है. कोर्ट ने एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा और कानूनी व्यवस्था पर जोर दिया है तो दूसरी तरफ मानव गरिमा की रक्षा भी सुनिश्चित की है. ऐसे संतुलित दृष्टिकोण को ‘अमानवीय’ कहना अनुचित है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा है.
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रिटायर्ड जजों ने तीन बातें साफ कीं-
- सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस पर पूरा भरोसा है.
- कोर्ट की टिप्पणियों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की कोशिश निंदनीय है.
- अवैध दस्तावेजों की जांच के लिए SIT पर विचार होना चाहिए.
उनका कहना है कि भारत का संवैधानिक ढांचा मानवता और सतर्कता दोनों की मांग करता है. न्यायपालिका ने इसी संतुलन को निभाया है और उसे समर्थन मिलना चाहिए न कि आलोचना.
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