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सत्ता जाते ही बिखरने लगी टीएमसी? विधानसभा धरने से नदारद रहे आधे से ज्यादा विधायक, अंदरूनी कलह आई सामने

West Bengal News: पश्चिम बंगाल की सत्ता हाथ से जाते ही तृणमूल कांग्रेस बिखरने लगी है. इसकी एक बानगी आज बंगाल विधानसभा परिसर में देखने को मिली. जहां बुधवार को टीएमसी के विधायकों ने प्रदर्शन किया, लेकिन उस प्रदर्शन में कई विधायक नहीं शामिल हुए.

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West Bengal News: पश्चिम बंगाल की सत्ता हाथ से जाते ही तृणमूल कांग्रेस बिखरने लगी है. इसकी एक बानगी आज बंगाल विधानसभा परिसर में देखने को मिली. जहां बुधवार को टीएमसी के विधायकों ने प्रदर्शन किया, लेकिन उस प्रदर्शन में कई विधायक नहीं शामिल हुए.

विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस पहली बार विपक्ष की भूमिका में है. बुधवार को प्रदर्शन में कई विधायकों के नहीं पहुंचने पर सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है.

टीएमसी आलाकमान की तरफ से सभी टीएमसी विधायकों को यह सूचना दी गई थी कि चुनाव के बाद हिंसा और हॉकरों के खिलाफ चलाये जा रहे अभियान के खिलाफ विधानसभा परिसर में अंबेडकर प्रतिमा के पास धरना प्रदर्शन में शामिल हों, लेकिन पार्टी के धरना प्रदर्शन में टीएमसी के 80 विधायकों में से सिर्फ 35 विधायक ही शामिल हुए. खुद के कार्यक्रम में आधे से भी ज्यादा विधायकों की गैरमौजूदगी ने पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान को सतह पर ला दिया.

टीएमसी ने क्यों किया प्रदर्शन?

दरअसल शुवेंदु सरकार ने नई सरकार के गठन के साथ ही पूरे पश्चिम बंगाल में सड़कों पर दुकान लगाने वाले हॉकरों के खिलाफ अभियान चला रही है. इसके अलावा सरकार ने बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई कर रही है. ऐसे में एक दिन पहले कोलकाता में टीएमसी की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई. जिसमें पार्टी की आगे की रणनीतियों को लेकर चर्चा की गई. जिसमें निर्णय लिया गया कि पार्टी को एक बार फिर से जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरना होगा.

टीएमसी नेताओं को जनता के बीच जाना होगा और जन आंदोलन के जरिये अपनी खोई जमीन को फिर से तलाशनी होगी. इसी को लेकर टीएमसी ने बुधवार को विधानसभा के अंदर धरना प्रदर्शन करने के लिए अपने विधायकों को नोटिस जारी किया था.

बुधवार को बंगाल विधानसभा के अंदर बीआर अंबेडकर की प्रतिमा के नीचे विरोध प्रदर्शन में शामिल विधायकों में कुणाल घोष, सोवांदेब चट्टोपाध्याय, नयना बनर्जी जैसे टीएमसी नेता मौजूद रहे.

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नोटिस के बाद भी नहीं आए विधायक

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद को खड़ा करना है. चुनाव में हार के बाद कार्यकर्ताओं से लेकर नेताओं के मनोबल पर बहुत बुरा असर पड़ा है. टीएमसी पिछले 15 सालों से सत्ता में थी. ऐसे में अचानक सत्ता पक्ष से विपक्ष में बैठना पार्टी के नेताओं को रास नहीं आ रहा है. इस समय टीएमसी नेतृत्व की जिम्मेदारी है कि वो पार्टी को एकजुट रखते हुए कार्यकर्ताओं और नेताओं के मनोबल को बढ़ाए.

-भारत एक्सप्रेस



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