अशोका युनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली ख़ान महमूदाबाद (Professor Ali Khan Mahbudabad) के एक विवादास्पद सोशल मीडिया पोस्ट की जांच कर रहे विशेष जांच दल (एसआईटी) को फटकार लगाया. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (16 जुलाई) को कहा कि प्रोफ़ेसर अली को दोबारा तलब करने की ज़रूरत नहीं है और ये भी पूछा कि SIT “गलत दिशा में क्यों जा रही है”.
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने ज़ोर देकर कहा कि जांच का दायरा प्रोफ़ेसर के ख़िलाफ़ दर्ज दो FIR तक सीमित है और कहा कि प्रोफ़ेसर अली ख़ान अब विचाराधीन मामले के अलावा किसी भी विषय पर लिखने के लिए स्वतंत्र हैं.
कोर्ट (Supreme Court) ने पूछा कि एसआईटी गलत दिशा में क्यों जा रही है. साथ ही SIT को चार हफ़्तों के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ दी है ज़मानत
अशोका युनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट के HoD प्रोफेसर अली ख़ान महमूदाबाद को मई में ऑपरेशन सिंदूर की ब्रीफ़िंग के लिए कर्नल सोफ़िया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह को सरकार द्वारा चुने जाने से संबंधित एक सोशल मीडिया पोस्ट के लिए गिरफ़्तार किया गया था. कुछ दिनों बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कुछ शर्तों के साथ ज़मानत दे दी कि वह इस मामले से संबंधित कोई लेख, ऑनलाइन पोस्ट या भाषण नहीं देंगे, पहलगाम हमले या ऑपरेशन सिंदूर पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे और अपना पासपोर्ट जमा कर देंगे.
प्रोफ़ेसर अली के वकील सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि एसआईटी ने प्रोफ़ेसर अली से पिछले 10 वर्षों में उनकी यात्राओं के बारे में भी पूछताछ की. कोर्ट ने सरकारी वकील से कहा कि जांच सही दिशा में होनी चाहिए.
आदेश में कहा गया, “हम कहते हैं कि याचिकाकर्ता विचाराधीन मामले पर टिप्पणी करने के अलावा कोई भी ऑनलाइन पोस्ट या लेख लिखने के लिए स्वतंत्र है. याचिकाकर्ता के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी रहेंगे.”
कोर्ट ने कहा कि एसआईटी का गठन “दोनों सोशल मीडिया पोस्ट में लिखे गए कंटेंट और उनमें निहित अभिव्यक्तियों की उचित समझ” के लिए किया गया था. अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एसआईटी की जांच दोनों मामलों तक ही सीमित रहनी चाहिए.
आपको एक डिक्शनरी की जरूरत है
अदालत ने कहा, “हम इस पर टिप्पणी नहीं करेंगे कि एसआईटी किस दिशा में जा रही है और किस प्रक्रिया में है, ये हमारा काम नहीं है. हालांकि, हम एसआईटी को अपने 28 मई के आदेश की याद दिलाते हैं. हम निर्देश देते हैं कि दोनों सोशल मीडिया पोस्ट के कंटेंट के संदर्भ में जांच जल्द से जल्द हो, लेकिन चार सप्ताह से अधिक देर न हो.”
सुनवाई के दौरान जब राज्य के वकील ने कहा कि क्या प्रोफेसर को किसी भी समय जांच में शामिल होने के लिए कहा जा सकता है, इस पर जस्टिस कांत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि आपको उनकी ज़रूरत नहीं है, आपको एक डिक्शनरी की जरूरत है.
प्रोफेसर अली की पोस्ट में क्या था?
पहलगाम आतंकी हमले के बाद जवाबी हमले के तौर पर भारत की ओर से लॉन्च किए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद एक सोशल मीडिया पोस्ट में प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद ने कहा था कि “उन्हें दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों द्वारा कर्नल (सोफिया) की सराहना करते देखकर खुशी हुई, लेकिन शायद वे इतने ही जोरदार ढंग से मांग भी कर सकते हैं कि भीड़ द्वारा हत्या, मनमाने ढंग से बुलडोज़र चलाने और भाजपा के नफ़रत फैलाने के शिकार हुए अन्य लोगों को भारतीय नागरिक के रूप में सुरक्षा दी जाए. दो महिला सैनिकों द्वारा अपने निषकर्ष पेश करने का दृष्टिकोण (Optics) महत्वपूर्ण है, लेकिन यह दृष्टिकोण ज़मीनी स्तर पर वास्तविकता में भी बदलना चाहिए, अन्यथा यह सिर्फ़ पाखंड है.”
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-भारत एक्सप्रेस
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