सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों व मुवक्किलों को कानूनी सलाह देने वाले वकीलों को लेकर बड़ा फैसला दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया है कि सीबीआई, ईडी या पुलिस वकीलों से उनके क्लाइंट के बारे में सवाल नही कर सकती है. जब तक कि मामला भारतीय साक्ष्य अधिनियम के विशेष अपवादों में न आए. सीजेआई बी आर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एन बी अंजारिया की पीठ ने यह फैसला दिया है.
आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह के समन उस आरोपी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं. जिसने अपने वकील पर भरोसा किया. ईडी और सीबीआई द्वारा जब्त किए गए डिजिटल उपकरण केवल वकील और अभियुक्त की मौजूदगी में ही अदालत में खोले जा सकते हैं. कोर्ट ने 12 अगस्त को मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था.
कोर्ट ने धारा 132 का हवाला देते हुए कहा कि वकीलों को समन तभी जारी किया जाएगा, जब मामला इन अपवादों में आए और समन में अपवादों का स्पष्ट उल्लेख हो, बिना इस आधार पर समन जारी करना गलत है.
विशेष अधिकारों का मामला
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने कहा था कि अगर किसी वकील को किसी भी मामले में बुलाया जा सकता है तो इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. हम नहीं चाहते कि इस पेशे को नुकसान हो, अगर ऐसा नियमित रूप से किया जाता रहा तो कोई भी वकील किसी संवेदनशील आपराधिक मामले में किसी को सलाह देने के बारे में नहीं सोचेगा. पिछली सुनवाई में सीजेआई बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि ईडी सारी हदें पार कर रही है.
कोर्ट ने कहा कि कुछ दिशा निर्देश जारी किया जाना चाहिए. सीजेआई बी आर गवई ने कहा था कि अगर वकील द्वारा दी गई सलाह गलत भी है, तो भी उसे कैसे समन जारी किया जा सकता है? यह विशेषाधिकार का मामला है. सीजेआई बीआर गवई ने कहा था कि कोर्ट ने बार-बार देखा है कि हाई कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद ईडी राजनीतिक मामलों में लगातार समन जारी कर रही है.
कानूनी पेशे की स्वतंत्रता को खतरा
SCAORA ने ईडी की कार्रवाई की कड़ी अस्वीकृति और स्पष्ट निंदा करते हुए कहा था कि यह अत्यधिक अनुचित है और कानूनी पेशे की स्वतंत्रता को खतरा पहुचाता है. ईडी की यह कार्रवाई न केवल अनुचित है, बल्कि जांच के दायरे से बाहर निकलने की एक परेशान करने वाली प्रवृति को दर्शाती हैं, जो कानूनी पेशे की स्वतंत्रता को खतरे में डालती है. कानून के शासन की नींव को कमजोर करती है. जब जांच एजेंसियों केवल कानूनी राय देने के लिए अधिवक्ताओं के खिलाफ बलपूर्वक उपाय करती हैं, तो वे केवल व्यक्तियों को ही निशाना नहीं बनाती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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