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दिल्ली 2020 दंगा मामले में आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के भाई सहित नौ बरी

दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने 2020 दंगा मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए शाह आलम समेत 9 लोगों को बरी कर दिया है. एडिशनल सेशन जज परवीन सिंह ने पुलिस की जांच और गवाहों के बयानों पर सवाल उठाते हुए कहा कि आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिले.

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Edited by Vaibhav Gupta

दिल्ली 2020 दंगा मामले में आप आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के भाई को कड़कड़डूमा कोर्ट से बरी राहत मिली है. कड़कड़डूमा कोर्ट के.एडिशनल सेशन जज परवीन सिंह ने नौ लोगों को बरी कर दिया है. जिसमें ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम शामिल है. इन सभी पर 2020 के उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान हुई हिंसा और तोडफ़ोड़ का आरोप लगा था.

गवाहों ने दी झूठी गवाही: कोर्ट

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पुलिस ऐसा कोई.सबूत पेश नही कर पाई, जिससे आरोप साबित होता हो. उन्होंने कहा कि गवाहों की गवाही आम किस्म की थी और उनमें कोई खास बात नहीं थी. कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए सभी को बरी किया था. कोर्ट ने कहा कि गवाहों ने घटनाओं की जगह के बारे में झूठी गवाही दी थी। इसलिए कोर्ट ने आलम, राशिद सैफी, मोहम्मद शादाब, हबीब, इरफान, सुहैल, सलीम, इरशाद और अजहर को बरी कर दिया है.

कोर्ट ने अपने फैसले में ये भी कहा कि अन्य घटनाओं को देखे तो उनकी गवाहियां सामान्य प्रकृति की हैं. गवाहों का ये बयान कि इनोवा, क्रिस्टा कार की घटना के स्थान के साथ-साथ रॉयल मोटर्स की घटना की तारीख झूठी पाई गई. इसलिए आरोपी को दोषी ठहराने के लिए इन गवाहों की गवाहियों पर भरोसा नहीं किया जा सकता.

बता दें कि इसको लेकर दयालपुर पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज किया गया था. अक्टूबर 2023 में इन नौ आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 149, 188, 323, 326,379,427,435,436,341 और 450 के तहत आरोप तय किया गया था.

पिछली कारवाई

इससे पहले कोर्ट ने गोपालपुरी इलाके में जन्नती मस्जिद पर हुई आगजनी के मामले में जेल में बंद तीनों आरोपी दीपक, प्रिंस और शिव को बरी कर दिया था. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि जिस तरीके से मामले की जांच की गई उसे देखकर दुःख होता है, आरोपियों को ऐसे सबूत के आधार पर गिरफ्तार और चार्जशीट दाखिल किया गया, जो कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं थे.

कोर्ट के अनुसार आरोपियों की गिरफ्तारी से लेकर पहली चार्जशीट दाखिल होने तक कोई ठोस सबूत मौजूद नही था. अदालत ने ये भी टिप्पणी की थी कि घटना के करीब डेढ़ साल बाद सितंबर 2021 में दो गवाह पेश किए गए. अदालत ने कहा कि ये भी संभव है कि इन गवाहों की वास्तव में कभी जांच ही नहीं हुई, क्योंकि जांच अधिकारी द्वारा केस डायरी में जिस स्थान पर उनके बयान दर्ज करने का दावा किया गया, वह स्थान उस दिन अस्तितमें ही नहीं था.

कोर्ट ने उम्मीद जताई कि जांच एजेंसियां इस मामले से सबक लेंगी और भविष्य में नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को तब तक प्रभावित नहीं करेंगी, जब तक किसी अपराध में उनकी संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद न हों.

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-भारत एक्सप्रेस



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