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यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दर्जनों याचिका दायर

यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ लगातार सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की जा रही हैं. एक नई याचिका मृत्युंजय तिवारी की ओर से दायर की गई है जिसमें इन नियमों को खारिज करने की मांग की गई है.

UGC Supreme Court

यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ लगातार विरोध बढ़ रहा है. इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का सिलसिला लगातार जारी है. मृत्युंजय तिवारी की ओर से दायर याचिका पर उनके वकील नीरज सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार के समक्ष जल्द सुनवाई की मांग की गई है. रजिस्ट्रार ने जल्द सुनवाई का भरोसा दिया है. यह याचिका मृत्युंजय तिवारी, सुप्रीम कोर्ट के वकील विनीत जिंदल सहित अन्य की ओर से दायर की गई है.

नए नियम ने बहस को दिया जन्म

याचिकाकर्ता ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 13 जनवरी 2026 को लागू नए नियमों के खिलाफ यह याचिका दायर किया है. इन नियमों का मूल उद्देश्य कैंपस के अंदर जातिगत भेदभाव को जड़ से खत्म करना और वंचित वर्ग के छात्रों को सुरक्षित शैक्षणिक परिवेश प्रदान करना था. हालांकि इन नियमों ने ऐसी बहस को जन्म दे दिया, जिसने न केवल छात्र राजनीति को गर्मा दिया है, बल्कि सरकार को भी अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है.

असंवैधानिक घोषित करने की मांग

याचिकाकर्ता की दलील है कि नियम 3 (सी) के तहत जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया है. इसके चलते सामान्य वर्ग से जुड़े लोगों को यदि किसी प्रकार की जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़े तो उन्हें औपचारिक शिकायत दर्ज कराने का अधिकार नहीं मिल पाता.

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दायर याचिका में इसे संविधान के समानता और मौलिक अधिकारों से जुड़ी धाराओं के खिलाफ बताया गया है. सुप्रीम कोर्ट से नियम को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है. साथ ही यह भी मांग की गई है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में बनाएगए सभी शिकायत निवारण तंत्र जाति निरपेक्ष हो और किसी भी वर्ग के व्यक्ति को भेदभाव करने की शिकायत से वंचित न किया जाए.

क्या है आखिर नए नियम?

यूजीसी के नए इक्विटी रूल के तहत सभी विश्वविद्यालयों, कॉलॉजों और उच्च शिक्षण संस्थानों को 24×7 हेल्पलाइन शुरू करनी होगी. इसके साथ ही Equal Opportunity Center की स्थापना करनी होगी. इतना ही नहीं इक्विटी कमिटी और इक्विटी स्क्वाड का गठन करना होगा. यूजीसी ने स्पष्ट किया है कि नियमों का पालन न करने पर संस्थानों की मान्यता रद्द करने या फंड रोकने जैसी सख्त कार्रवाई की जा सकती है.

UGC दलील है कि वर्ष 2020 से 2025 के बीच जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है. यूजीसी के अनुसार रोहित वेमुला और पायल तड़वी मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद ऐसी निगरानी व्यवस्था जरूरी हो गई थी. इसको लेकर दर्जनों याचिका अभी तक दायर की जा चुकी है. दायर सभी याचिकाओं में एक ही मांग है कि लागू नियम को असंवैधानिक घोषित किया जाए.



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