उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए इंडिया अलायंस के उम्मीदवार और पूर्व न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा की गई टिप्पणी से सियासी पारा चढ़ गया. कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने सुदर्शन रेड्डी पर की गई अमित शाह की टिप्पणी को दुर्भाग्यपूर्ण और पूर्वाग्रही बताते हुए नाराजगी जताई थी. पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि यह न्यायिक स्वतंत्रता पर हमला है और लोकतंत्र के लिए खतरा है.
पूर्व न्यायाधीशों के उपरोक्त बयान ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी, क्योंकि सुदर्शन रेड्डी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश हैं और अब विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं. अमित शाह ने रेड्डी की उम्मीदवारी को राजनीतिक साजिश बताते हुए आलोचना की थी, जिसे कुछ जजों ने न्यायपालिका की गरिमा पर प्रहार माना.
पूर्व न्यायाधीशों की तीखी प्रतिक्रिया
इस विवाद में अब एक नया मोड़ आया है. एक अन्य समूह के पूर्व न्यायाधीशों ने उन सेवानिवृत्त जजों के बयान पर तीखी असहमति जताई है, जो अमित शाह की टिप्पणी की निंदा कर रहे थे. उन्होंने इसे राजनीतिक पक्षपातपूर्णता का उदाहरण बताया और कहा कि ऐसे बयान न्यायपालिका की छवि को धूमिल करते हैं. इस समूह ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा कि हर बड़े राजनीतिक घटनाक्रम पर एक ही तबके से बयान आना एक पैटर्न बन गया है. उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता की आड़ में राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देना गलत है. यह बयान सोशल मीडिया और न्यूज पोर्टलों पर वायरल हो रहा है, जहां इसे न्यायपालिका की आंतरिक असहमति के रूप में देखा जा रहा है. पूर्व जजों का मानना है कि सुदर्शन रेड्डी ने स्वेच्छा से राजनीति में कदम रखा है, इसलिए उन्हें अन्य उम्मीदवारों की तरह आलोचना का सामना करना चाहिए.
यह है पूर्व न्यायाधीशों का पूरा बयान
पूर्व न्यायाधीशों के समूह ने बयान जारी कर कहा, “हम इस देश के पूर्व न्यायाधीशों के रूप में, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और कार्यकर्ताओं के एक समूह द्वारा हाल ही में जारी किए गए बयान से अपनी तीखी असहमति दर्ज कराने के लिए बाध्य महसूस करते हैं.
यह एक पैटर्न बन गया है, जिसमें हर बड़े राजनीतिक घटनाक्रम का सामना एक ही तबके से बयानों से होता है. ये बयान न्यायिक स्वतंत्रता की भाषा में अपनी राजनीतिक पक्षपातपूर्णता को छिपाने के लिए दृढ़ हैं. यह प्रथा उस संस्था के लिए बहुत बड़ा नुकसान करती है जिसमें हम कभी सेवा करते थे, क्योंकि यह न्यायाधीशों को राजनीतिक कर्ता के रूप में पेश करती है. यह उस समृद्धि, गरिमा और निष्पक्षता को नष्ट करती है जिसकी एक न्यायिक अधिकारी के पद को आवश्यकता होती है.
एक साथी सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने अपनी इच्छा से भारत के उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने का फैसला किया है. ऐसा करके उन्होंने विपक्ष द्वारा समर्थित उम्मीदवार के रूप में राजनीतिक क्षेत्र में कदम रखा है. ऐसा चुनाव करने के बाद, उन्हें राजनीतिक बहस के क्षेत्र में किसी भी अन्य प्रतियोगी की तरह अपनी उम्मीदवारी का बचाव करना होगा.
इसके विपरीत सुझाव देना लोकतांत्रिक विमर्श को दबाना और राजनीतिक सुविधा के लिए न्यायिक स्वतंत्रता की आड़ का दुरुपयोग करना है. किसी राजनीतिक उम्मीदवार की आलोचना से न्यायिक स्वतंत्रता को कोई ख़तरा नहीं है.
न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को वास्तव में तब धूमिल करता है जब पूर्व न्यायाधीश बार-बार पक्षपातपूर्ण बयान देते हैं, जिससे यह आभास होता है कि संस्था स्वयं राजनीतिक लड़ाइयों से जुड़ी हुई है.”

राजनीतिक और न्यायिक निहितार्थ
यह बयान न्यायपालिका और राजनीति के बीच की रेखा पर बहस छेड़ रहा है. कई विशेषज्ञों का कहना है कि सेवानिवृत्त जजों के राजनीतिक बयान लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय विभाजन पैदा कर सकते हैं. उपराष्ट्रपति चुनाव में सुदर्शन रेड्डी की उम्मीदवारी पहले से ही विवादास्पद थी, और अब यह बयान एनडीए और इंडिया ब्लॉक के बीच तनाव बढ़ा सकता है. पूर्व जजों का यह समूह मानता है कि न्यायपालिका को राजनीतिक झगड़ों से दूर रखना चाहिए, वरना संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे. इस घटना से साफ है कि रिटायर्ड जजों के बीच भी मतभेद हैं, जो न्यायिक सुधारों पर असर डाल सकता है. कुल मिलाकर, यह विवाद न्यायिक स्वतंत्रता की परिभाषा पर नए सवाल खड़े कर रहा है.
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