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जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर मिले जला हुआ कैश के मामले दायर, मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास से मिले जला हुआ कैश मामले में सुनवाई की. वकील कपिल सिब्बल ने मामले को संविधान पीठ के पास भेजने की मांग की, तो जस्टिस दीपांकर दत्ता ने प्रक्रिया पर सवाल उठाए.

Justice Yashwant Verma

जस्टिस यशवंत वर्मा

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर मिले जला हुआ कैश के मामले दायर जस्टिस वर्मा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील कपिल सिब्बल ने मामले को संविधान पीठ के पास भेजने की मांग की. जिसपर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि आप पहले क्यों नहीं आए. उन्होंने कहा कि संविधान पीठ को क्यों सुनना चाहिए. इसपर सिब्बल ने कहा कि हम पहले क्यों नही आए, क्योंकि टेप जारी हो चुका था और मेरी प्रतिष्ठा पहले ही धूमिल हो चुकी थी.

जस्टिस दत्ता ने कहा कि लेकिन आपके अनुसार यह एक संवैधानिक मुद्दा है, है न और यह जजों के अधिकार क्षेत्र से बाहर है? तो आपको संपर्क करना चाहिए था. टेप लिंक से संबंधित मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सहमति जताते हुए हुए कहा कि हम मानते हैं कि प्रक्रिया को लेकर आपका तर्क सही है. जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ मामले में सुनवाई कर रही है.

महाभियोग प्रक्रिया पर चर्चा

सुनवाई के दौरान जस्टिस यशवंत वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने ने कहा कि महाभियोग संसद की प्रक्रिया है. उन्होंने कहा कि सीजेआई द्वारा महाभियोग की सिफारिश किया जाना गलत है. सिब्बल ने कहा कि आपराधिक कार्रवाई का मतलब है अभियोजन की मंजूरी देना और उसे अभियुक्त बनाना. जस्टिस दत्ता ने कहा कि अगर कानून के तहत केंद्र सरकार को किसी को हटाने का अधिकार है, तो वे ऐसा कर सकते है. लेकिन ऐसा कोई कानून फिलहाल नही है. अगर कानून लाया जाता है कि हम उसका परीक्षण करेंगे.

सीजेआई की भूमिका

जस्टिस दत्ता ने कहा कि इन फैसलों के आने की वजह स्पष्ट है और सीजेआई पीएम और राष्ट्रपति को इसको लेकर सूचित कर सकते हैं. जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि 1999 में आंतरिक प्रक्रिया शुरू की गई थी ताकि यह देखा जा सके कि क्या कार्रवाई की जा सकती है. जस्टिस दत्ता ने कहा कि सीजेआई कोई पोस्ट ऑफिस नहीं है. सीजेआई की राष्ट्र के प्रति भी जिम्मेदारी बनती है. अगर सीजेआई के पास ऐसा मटेरियल उपलब्ध है, जिनके आधार पर उन्हें जज का कदाचार लगता है तो निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को सिफारिश भेज सकते हैं.

सिब्बल ने कहा कि इन हाउस इंक्वायरी कॉन्फिडेंशियल होगी. यह स्पष्ट है और इस मामले में ऐसा नहीं हुआ. जस्टिस दत्ता ने याचिकाकर्ता के वकील कपिल सिब्बल से पूछा कि क्या महाभियोग प्रक्रिया में कोई चूक हुई? संसद अपनी मर्जी से काम करती है और अगर वह खुद ही हटाने की सिफारिश करती है, तो आपको पता है कि उसके सदस्य कौन होंगे? क्या समिति के उच्च स्तरीय सदस्य प्रारंभिक रिपोर्ट से प्रभावित होंगे? इसपर सिब्बल ने कहा कि मैं ऐसा नही कह रहा, मैं कह रहा हूं कि मुझे सार्वजनिक रूप से दोषी ठहराया गया है, क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट से लिया गया है.

जस्टिस दत्ता ने कहा कि समिति के समक्ष आपके पास अवसर था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आप न्यूज रिपोर्ट के आधार पर यहां नही आ सकते. आपको पहले आना चाहिए था.

जस्टिस दत्ता ने कहा कि आपके आचरण बहुत कुछ कहता है. आप अनुकूल निष्कर्ष का इंतजार कर रहे थे. उसके बाद आप सुप्रीम कोर्ट आए. जस्टिस दत्ता ने कहा कि सबकुछ सार्वजनिक है तो क्या लोकसभा अध्यक्षकदम नहीं बढ़ाएंगे. उन्होंने कहा कि महाभियोगएक राजनीतिक फैसला है.

जस्टिस दत्ता ने कहा कि प्रक्रिया से परे कुछ भी कार्रवाई शुरू करना और हटाना दो अलग-अलग बातें है. आंतरिक प्रक्रिया से बंधे मुख्य न्यायाधीश ने ठीक यही किया है. जस्टिस दत्ता ने यह साफ कर दिया है कि बिना सीजेआई की मंजूरी के किसी भी जज के खिलाफ एफआईआर नहीं कि जा सकती.


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भारत एक्सप्रेस



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