सांकेतिक तस्वीर.
दिल्ली की एक अदालत ने दहेज हत्या और क्रूरता के मामले में आरोपी और उसके परिवार को बरी कर दिया. अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि महिला ने आत्महत्या की थी. साथ ही, इस बात का भी कोई ठोस सबूत नहीं मिला कि महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था.
आरोपियों की रिहाई पर कोर्ट की टिप्पणी
कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पंकज अरोड़ा ने महिला के पति प्रताप सिंह, सास भगवती देवी और ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष नीतू की मौत का कारण साबित करने में असफल रहा.
अगस्त 2017 में नीतू संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई थी. अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था. हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया कि विसरा रिपोर्ट उपलब्ध न होने के कारण मृत्यु के कारण पर कोई स्पष्ट राय नहीं दी जा सकती. रिपोर्ट के अनुसार, महिला के शरीर पर मौत से पहले किसी चोट के निशान भी नहीं पाए गए. इसलिए, यह साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं था कि यह आत्महत्या का मामला था.
मुख्य गवाहों के बयान से मामला हुआ कमजोर
मृतका के पिता ने आरोप लगाया था कि मई 2014 में शादी के तुरंत बाद नीतू को दहेज के लिए परेशान किया जाने लगा था और इस मामले में सोनिया विहार थाने में प्राथमिकी भी दर्ज कराई गई थी. हालांकि, सुनवाई के दौरान मुख्य गवाह—मृतका के पिता, माता और भाई अपने पहले दिए गए बयान से पलट गए.
मुख्य गवाहों ने अदालत में कहा कि नीतू को बचपन से ही मिर्गी के दौरे पड़ते थे और उसे दहेज के लिए प्रताड़ित नहीं किया गया था. मृतका के पिता ने यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी बेटी और उसके ससुराल वालों के बीच किसी भी झगड़े के बारे में कभी नहीं सुना था.
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अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर अभियोजन पक्ष का मामला संदिग्ध हो जाता है. इस कारण से, संदेह का लाभ निश्चित रूप से आरोपियों को मिलना चाहिए. परिणामस्वरूप, न्यायालय ने सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया.
-भारत एक्सप्रेस
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