सुप्रीम कोर्ट ने निर्विरोध चुनाव जीतने वाले उम्मीदवारों के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि यह बहुत रोचक मुद्दा है. सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता को सरकार के पास जाने को कहा. यह याचिका विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की ओर से दायर किया गया था.
कोर्ट ने याचिकाकर्ता से यह भी कहा कि उनकी मांग पर अगर सरकार विचार नही करती है तो वापस वो अदालत का रुख कर सकते है. आरपी अधिनियम 1951 की धारा 53(2) और चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 11 पर सवाल उठाते हुए यह याचिका दायर की गई थी. ये प्रावधान उन उम्मीदवारों के लिए जीत की घोषणा की अनुमति देते हैं, जो चुनाव में निर्विरोध अकेले खड़े होते हैं.
निर्विरोध जीत पर उठा सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि क्या इसको लेकर सरकार से संपर्क करना उचित नहीं होगा. अगर कोई समाधान नहीं निकलता तो अदालत का रुख किया जाए. यह एक अच्छा विचार हैं, अगर सरकार कुछ ना करे तब अदालत का रुख किया जाए. भारत में जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 53(2) के अनुसार, यदि किसी सीट के लिए उतने ही उम्मीदवार रह जाए, जितने पद हैं, तो उन्हें बिना मतदान के विजयी घोषित कर दिया जाता है. लेकिन अब इस प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह नियम लोकतंत्र की मूल भावना, जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता की सरकार के अनुकूल है? इस मामले में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हकफनामा दाखिल कर कहा कि लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना बहुत ही दुर्लभ है.
चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा था कि 1991 से अब तक ऐसा सिर्फ एक बार हुआ है. उन्होंने आगे कहा था 1971 से आज तक, यानी पिछले 54 वर्षों में कुल छह निर्विरोध चुनाव हुए हैं. 1951 से अब तक हुए 20 आम चुनावों में केवल नौ निर्विरोध चुनाव हुए हैं.
चुनाव आयोग ने कहा था कि नोटा को सभी प्रत्यक्ष निर्विरोध चुनावों में अनिवार्य रूप से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के रूप में मानना कानून में सही नही है. इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 और चुनाव संचालन नियम 1961में विधायी संशोधन की आवश्यकता होगी.
-भारत एक्सप्रेस
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