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‘विवाह पूर्व संबंध अब आम, कानून दो वयस्कों को नहीं रोकता’… तेलंगाना पुलिस भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट का धमाकेदार फैसला

Supreme Court Judgment: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दो वयस्कों के बीच सहमति से बना संबंध चरित्र पर कलंक नहीं है, भले ही वह शादी में न बदला हो. कोर्ट ने केवल पुराने समझौते के आधार पर तेलंगाना पुलिस भर्ती बोर्ड द्वारा उम्मीदवार की नियुक्ति रद्द करने के फैसले को खारिज कर दिया.

Supreme Court order
Edited by Shubhra Rai

Supreme Court Judgment: सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बना शारीरिक संबंध किसी व्यक्ति के चरित्र पर कलंक नहीं है. कोर्ट ने कहा कि महज इसलिए कि रिश्ता शादी में तब्दील नहीं हुआ. कोर्ट ने यह भी कहा कि यह मानने का कोई आधार नहीं है कि एक पक्ष ने दूसरे पक्ष को धोखा दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना पुलिस कॉन्स्टेबल भर्ती में एक अभ्यर्थी की नियुक्ति रद्द किए जाने के फैसले को निरस्त करते हुए यह टिप्पणी की है.

झूठा वादा कर संबंध बनाने के आरोप

आरोप है कि 2014 में शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाने के आरोप लगाने वाली शिकायतकर्ता के बाद मुकदमा दर्ज किया गया था. बाद में दोनों के बीच में समझौता हो गया और लोक अदालत ने मामले को खत्म कर दिया. अभ्यर्थी ने इस बात की जानकारी तेलंगाना राज्य पुलिस भर्ती के लिए भरे गए आवेदन में भी दिया था.

लेकिन उसके बावजूद तेलंगाना राज्य पुलिस भर्ती बोर्ड ने यह कहते हुए उसकी नियुक्ति को रद्द कर दिया कि मामला नैतिक अधमता से जुड़ा है. जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि हर प्रेम संबंध विवाह तक नहीं पहुचता और केवल इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि किसी एक पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया है.

शादी का वादा करके बलात्कार का मामला दर्ज

दरअसल गजूला तिरुपति से जुड़ा यह मामला है. जिन्हें मानदेय प्राप्त कैडेट प्रशिक्षु पुलिस कांस्टेबल के पद के लिए अस्थायी रूप से चयनित किया गया था. तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड ने उनका चयन इस आधार पर रद्द कर दिया था कि उनके खिलाफ 2014 में शादी का वादा करके बलात्कार का मामला दर्ज किया गया था, जो नैतिक पतन को दर्शाता है. तिरुपति ने खुद अपने आवेदन पत्र में इस मामले का उल्लेख किया था.

अदालत ने कहा कि वर्तमान समय मे विवाह पूर्व संबंध आम हैं और कानून दो वयस्कों को अपनी पसंद का संबंध बनाने से नहीं रोकता. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लोक अदालत में हुए समझौते को अपराध स्वीकार करने के रूप में नहीं देखा जा सकता.

आपसी सहमति पर आधारित

यदि रिकॉर्ड पर यह दिखाने वाला कोई सबूत नहीं है कि पीड़िता पर दबाव डालकर समझौता कराया गया था, तो नियोक्ता केवल समझौता के आधार पर उम्मीदवार के चरित्र पर नकारात्मक निष्कर्ष नहीं निकाल सकता. कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि यदि दो वयस्कों में बीच लंबे समय तक संबंध रहा हो, तो सामान्य रूप से यह माना जाएगा कि वह संबंध आपसी सहमति पर आधारित था.

ऐसे मामलों में केवल यह आरोप की शादी का वादा पूरा नहीं हुआ, अपने आप धोखाधड़ी साबित नहीं करता. कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी उम्मदीवार को नौकरी देने से इंकार करने के लिए नियोक्ता के पास यह दिखाने वाला ठोस साक्ष्य होना चाहिए कि अपराध वास्तव में हुआ था और संबंधित व्यक्ति उसमें शामिल था. इस मामले को आगे नहीं बढ़ाया था और समझौता के लिए सहमति दी थी.

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-भारत एक्सप्रेस 



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