Supreme Court: कुष्ठ रोगियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार किया है. जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की बेंच ने राज्य सरकारों को कुष्ठ रोगियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कानूनों को हटाने का निर्देश दिया है.
पिछली सुनवाई में कोर्ट ने सभी राज्यों को समिति गठित करने को कहा था, जो उन कानूनों, नियमों, विनियमों, उप- नियमों आदि में उन प्रावधानों की पहचान कर जो कुष्ठ रोग से पीड़ित या ठीक हो चुके लोगों के साथ भेदभाव कर रहें है.
साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकारों को ऐसे भेदभावपूर्ण प्रावधानों को हटाने के लिए कदम उठाने को कहा था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकारें विशेष एक दिवसीय विधानसभा सत्र बुलाए या अध्यादेश पारित करें. ऐसा करके राज्य सरकारें इन लोगों के लिए बहुत बड़ा कार्य करेगी.
कुष्ठ रोगियों के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
कोर्ट ने यह आदेश फेडरेशन ऑफ लेप्रोसी ऑर्गनाइजेशन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद दिया है. दायर याचिका में कहा गया था कि कुष्ठ रोग को एक भयावह बीमारी माना जाता था, क्योंकि यह लाइलाज, अत्यधिक संक्रामक और संक्रमण था.
उस समय कुष्ठ रोगियों को बड़े पैमाने पर समाज से अलग करने की आवश्यकता थी, इसलिए भारतीय कुष्ठ अधिनियम, 1898 बनाया गया था इसमें कठोर प्रावधान किए गए थे, जैसे बिना वारंट के गिरफ्तारी, उन्हें कुष्ठ आश्रमों में रखना संपत्ति के अधिकार और मतदान के अधिकार से दखल देना शामिल था.
साथ ही उन्हें रोजगार तलाशने की अनुमति नही थी. 1979 में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में मल्टी-ड्रग थेरेपी को किसी भी स्तर पर कुष्ठ रोग के इलाज के रूप में विकसित किया गया था. 1981 में भारत मे कुष्ठ रोग को पूरी तरह से ठीक करने के लिए इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है.
याचिका में यह भी कहा गया था कि कुष्ठ रोगियों से भेदभाव के चार ऐसे कानून थे जिन्हें 2019 में संशोधित किया गया था. लेकिन अभी भी 100 से अधिक कानून ऐसे है जिनमें ऐसे भेदभावपूर्ण प्रावधान बने हुए हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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