देशभर के जिला अदालतों में फांसी से संबंधित लंबित मुकदमों की संख्या पर चिंता व्यक्त की है. कोर्ट ने हाईकोर्ट्स द्वारा मुहैया कराए गए आंकड़ों को निराशाजनक और चिंताजनक बताया है. जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस पंकज मित्तल की पीठ ने यह चिंता व्यक्त की है.
रिपोर्ट के मुताबिक देशभर की जिला अदालतों में 8,82578 मुकदमे निपटारे के लिए लंबित हैं. जबकि सुप्रीम कोर्ट लंबित मुकदमों को छह महीनों में निपटारा करने को कह चुका है. कोर्ट 10 अप्रैल 2026 को इस मामले में अगली सुनवाई करेगा. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स से लंबित निष्पादन याचिकाओं के निपटारे के लिए अपनी जिला अदालतों के साथ प्रभावी कदम सुनिश्चित करने को कहा हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने फांसी मामलों के आंकड़े मांगे
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्री को आदेश दिया है कि अदालत के आदेश की कॉपी तत्काल सभी हाईकोर्ट्स को भेजे. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब एक डिक्री पारित हो जाती है, लेकिन उसे लागू करने में सालों लग जाते है, यह न्याय का मजाक बन गया है. कोर्ट ने इससे पहले 6 मार्च 2025 को इसको लेकर आदेश दिया था. कोर्ट ने सभी जिला अदालतों से 6 महीने में लंबित मुकदमों का निपटारा करने को कहा है.
साथ ही कोर्ट ने देशभर के सभी हाईकोर्ट्स से देशभर में फांसी से संबंधित लंबित मुकदमों की जानकारी मुहैया कराने का निर्देश दिया था. लेकिन कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा अभी तक आकंड़े मुहैया नही कराए जाने पर चिंता व्यक्त की है. कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से स्पष्टीकरण देने को कहा है. साथ ही कोर्ट ने 2 सप्ताह में इससे संबंधित आंकड़े मुहैया कराने का निर्देश दिया है.
अलग-अलग हाईकोर्ट्स द्वारा मुहैया कराए गए आंकड़ों के मुताबिक बॉम्बे- 3.41 लाख, मद्रास-86148, केरल-82997, आंध्र प्रदेश-68137, इलाहाबाद-27825, कोलकाता-31091, पटना-22449, दिल्ली-29769, राजस्थान-22449, हरियाणा 17440, छत्तीसगढ़ 10859, तेलंगाना-29879, उत्तराखंड 3595, त्रिपुरा 1063, सिक्किम 29 जम्मू कश्मीर 9925, मध्य प्रदेश 52997 गुवाहाटी 4281 मामले लंबित है. हालांकि पिछले 6 महीनों में 3,38,685 याचिकाओं का निपटारा किया गया है, लेकिन इसके बावजूद अभी भी बड़ी संख्या में मुकदमा लंबित है.
फांसी मामलों में लंबित सुनवाई को लेकर वकीलों की चिंता
सुप्रीम कोर्ट के वकील नरेंद्र मिश्रा के मुताबिक 6 महीने में मुकदमा का निपटारा संभव नही होगा. ऐसे में निचली अदालत के जज सिर्फ इसी मामलों की सुनवाई करने लगेगा. ऐसे में बाकी लंबित मुकदमों पर इसका असर पड़ेगा. जबकि सुप्रीम कोर्ट के वकील आशीष चौबे की माने तो मौत से संबंधित मामलों की सुनवाई समय सीमा के भीतर होना चाहिए, क्योंकि आरोपी के परिवार वाले इसको लेकर अधिक परेशान रहते है. ऐसे में मुकदमा लंबा चलने से दोषी इसको आधार बनाकर रिहाई की मांग कर सकता है.
बता दें कि भारत में फांसी को लेकर बहस काफी समय से चल रही है. यह सिर्फ अदालती मामला नही है, बल्कि यह हमारी लोकतांत्रिक संवेदनशीलता के लिए परीक्षा की घड़ी है. भारत की न्यायिक व्यवस्था में मौत आज भी एक वैधानिक प्रावधान है.
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