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पर्यावरणीय तबाही पर सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार से मांगा विस्तृत रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हिमालय प्रदेश सरकार से पर्यावर्णीय तबाही पर विस्तृत जवाब मांगा है. कोर्ट ने बादल फटने और भूस्खलन से हुई तबाही से संबंधित जानकारी मांगी है. कोर्ट ने पूछा कि पिछले 20 वर्षों में गैर-वन उपयोग के लिए कितनी भूमि डायवर्ट की गई है

Edited by Vaibhav Gupta

सुप्रीम कोर्ट ने हिमालय प्रदेश सरकार से पर्यावर्णीय तबाही पर विस्तृत जवाब मांगा है. कोर्ट ने बादल फटने और भूस्खलन से हुई तबाही से संबंधित जानकारी मांगी है.

कोर्ट ने पूछा कि पिछले 20 वर्षों में गैर-वन उपयोग के लिए कितनी भूमि डायवर्ट की गई है, वृक्ष प्रजातियों का डेटा क्या है और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई को लेकर जानकारी मांगी है. जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सरकार से 28 अक्टूबर तक रिपोर्ट मांगी है.

हिमालयी क्षेत्रो में गंभीर संकट

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पूरा हिमालयी क्षेत्र गंभीर संकट से गुजर रहा है, जहां अनियंत्रित विकास गतिविधियां प्राकृतिक आपदाओं को और गहरी कर रही है. इसके अलावे कोर्ट ने भूकंपीय और भूस्खनल जोन, इको-सेंसिटिव जोन की अधिसूचना, लगाए गए पेड़ों की संख्या, उनकी जीवित रहने की दर और फंड का इस्तेमाल, हिमनद पिघलने पर अध्ययन और भविष्य के प्रभाव का आकलन.

इसके अलावे कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि राज्य में कितने चार लेन हाइवे की संख्या है, उन पर भूस्खनल की कितनी घटनाएं हुई है और उसको लेकर सरकार द्वारा क्या कदम उठाए गए हैं. कोर्ट ने पूछा कि कितनी नदियों पर परियोजनाएं बनीं और उनके समग्र प्रभाव के अध्ययन से संबंधित जानकारी मांगी है.

कोर्ट ने पूछा कि खनन और भारी मशीनरी के मानदंड की जानकारी मांगी है और कोर्ट ने पूछा है कि होटलों और रेंटल भवनों की अनुमति, बहुमंजिला निर्माण पर रोक और टाउन प्लांनिग एक्ट के तहत कितने मुकदमे दर्ज किए गए हैं. इससे पहले जस्टिस मेहता ने कहा था कि यह केवल हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र तक सीमित रहेगा.कोर्ट हिमाचल प्रदेश में परिस्थितिकी और पर्यावरणीय स्थितियों पर स्वतः संज्ञान मामले में सुनवाई कर रही है.

बाढ़ व भूस्खलन से सैकड़ों की मौत

पिछली सुनवाई में जस्टिस जेबी पारदीवाला ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि हिमाचल प्रदेश नक्से से गायब हो सकता है. कोर्ट ने परिस्थितिक रूप से नाजुक हिमालयी क्षेत्र में अनियंत्रित विकास और प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि वह दिन दूर नहीं जब पूरा हिमाचल प्रदेश ही लुप्त हो जाएगा. कोर्ट ने शिमला में श्री तारा देवी हिल के संरक्षण से संबंधित सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी.

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि पिछले कई वर्षों से गंभीर पर्यावरणीय असंतुलन और खराब हालत की वजह से हिमाचल प्रदेश में भारी प्राकृतिक आपदाएं आ रही है. इस साल भी बाढ़ और भूस्खलन में सैकड़ों लोगों की मौत हुई और हजारों संपत्तियां तबाह हो गई. ऐसा लगता है कि प्रकृति हिमाचल प्रदेश में हो रही गतिविधियों से नाराज है.

मानवीय गतिविधियों का परिणाम ये आपदाएं

कोर्ट ने कहा था कि हिमाचल में प्राकृतिक आपदाएं मानवीय गतिविधियों का परिणाम हैं. पहाड़ों का दरकना, लगातार भूस्खलन, सड़कों का धंसना, मकानों का गिरना यह सब प्रकृति का नहीं बल्कि इंसानों का किया धरा है. कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा बनाई जा रही चार लेन सड़कों के निर्माण पर भी सवाल उठाए थे.

कोर्ट ने आगे कहा था कि इन सड़कों के निर्माण में भारी मशीनें और विस्फोटक का इस्तेमाल किया जाता है. जिसके चलते प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है. जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष परिणामों का हवाला देते हुए, अदालत ने तेजी से पीछे हट रहे बारा शिंगरी ग्लेशियर के कारण बर्फ़बारी के पैटर्न में बदलाव और अनियमित मौसम की घटनाओं की ओर इशारा किया था, जो ढलानों को अस्थिर कर रहे है.

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-भारत एक्सप्रेस



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