चुनाव से पहले मुफ्त की रेवड़ी बाटने पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को आड़े हाथ लिया है. कोर्ट ने केंद्र सरकार सहित अन्य को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है. सीजेआई सूर्यकांत, जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी की है. सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अगर आप फ्री बिजली, फ्री खाना और फ्री साइकिल देते हैं तो आप किस तरह का कल्चर बना रहे है.
कोर्ट ने कहा कि करदाता के अलावे इन योजनाओं का खर्च कौन उठाएगा. उन्होंने कहा कि भोजन और बिजली के बाद अब सीधा कैश ट्रांसफर किया जा रहा है. कोर्ट ने कहा कि रोजगार देने पर राज्य सरकार को ध्यान देना चाहिए. सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि हम किस तरह का कल्चर बना रहे हैं. यह समझ मे आता है कि आप एक वेलफेयर कल्चर बना रहे है. उन्होंने कहा कि यह समझ में आता है कि एक वेलफेयर सिस्टम के तहत लोगों को बिजली देना चाहते हैं. जो बिजली का चार्ज नहीं दे सकते. लेकिन जो दे सकते हैं और जो नहीं दे सकते, उनके बीच फर्क किए बिना अगर आप बांटना शुरू करते हैं. तो क्या यह एक तरह की तुष्टिकरण पॉलिसी नहीं होगी?
कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को फटकारा
कोर्ट ने यह टिप्पणी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की है. जिसमें तमिलनाडु सरकार की कुछ समुदायों के लिए बिजली टैरिफ में.सब्सिडी स्कीम को चुनौती दी गई थी. इस स्कीम से पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ा, जिसके खिलाफ तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. कोर्ट ने इलेक्ट्रिसिटी (संशोधन) अधिनियम 2024 के रूल 23 का हवाला देते हुए कहा कि पावर कंपनियों को टैरिफ के जरिये लागत वसूली सुनिश्चित करनी चाहिए.
कोर्ट ने कहा कि इस तरह के फिजूलखर्ची से देश का आर्थिक विकास बाधित होगा. कोर्ट ने कहा कि जो बहन नही कर सकते उनके लिए राज्य का कर्तव्य है कि क्या ये सुविधाएं प्रदान करें, लेकिन जो लोग मुफ्त सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, उनकी जेब में सबसे पहले पैसा जा रहा है. कोर्ट ने कहा क्या यह ध्यान देने योग्य बात नही? हम ऐसे राज्यों को जानते हैं, जहां बड़े जमींदारों को भीमुफ्त बिजली मिलती है.
कोर्ट ने कहा कि हम केवल तमिलनाडु के संदर्भ में ही बात नहीं कर रहे हैं. हम इस तथ्य पर विचार कर रहे हैं कि चुनाव से ठीक पहले योजनाएं क्यों घोषित की जा रही है. सभी राजनीतिक दलों, समाजशास्त्रियों को अपनी विचारधारा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है. यह कब तक चलता रहेगा.
सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया
मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि संसाधनों के आवंटन में समानता होनी चाहिए और यह शासन का मामला है. सीजेआई ने कहा कि राज्य घाटे में चल रहे है, फिर भी मुफ्त की सुविधाएं बांटी जा रही है. जस्टिस बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा कि टैरिफ अधिसूचित होने के बाद अचानक ही उदारता दिखाई जा रही है.
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-भारत एक्सप्रेस
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