सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के समान उत्तराधिकार की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि सभी महिलाओं को बराबर अधिकार का एकमात्र रास्ता यूनिफॉर्म सिविल कोर्ट (UCC) लाना है. कोर्ट ने यह टिप्पणी मुस्लिम महिलाओं को उत्तराधिकार में समान हिस्सा देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान की है.
समान नागरिक संहिता पर बन सके कानून
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने विधायिका से पर्सनल लॉ की वजह से पैदा होने वाली मुश्किलों से बचने के लिए इस पर काम करने का सुझाव दिया है. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि व्यक्तिगत कानूनों को अमान्य घोषित करके एक शून्य स्थिति उत्पन्न करना. बेहतर यही होगा कि इसे विधायी विवेक पर छोड़ दिया जाए ताकि विधायिका समान नागरिक संहिता पर कानून बना सके.
कोर्ट ने पहले ही समान नागरिक संहिता की सिफारिश की है. देखिए एक मुस्लिम पुरुष, वह किसी भी प्रक्रिया का पालन करते हुए एकतरफा तलाक दे सकता है. क्या हम व्यक्तिगत कानून पर आधारित सभी द्विविवाह संबंधों को अमान्य घोषित कर सकते हैं? नही. इसलिए हम मौलिक कर्तव्यों को प्रभावी बनाने के लिए विधायी शक्ति पर निर्भर रहना होगा.
महिलाओं के अधिकारों के उल्लंघन
सीजेआई ने कहा कि जैसा कि सही कहा गया है, इसका उत्तर समान नागरिक संहिता है. मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत उत्तराधिकार कानूनों में महिलाओं के अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि अगर पूरे देश मे सभी महिलाओं के लिए समान उत्तराधिकार अधिकार सुनिश्चित करने हैं, तो इसके लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे व्यापक विधायी उपाय पर विचार किया जा सकता है.
सरकार को इसपर विचार करने की जरूरत
हालांकि कोर्ट ने संकेत दिया है कि यह नीतिगत मामला है और सरकार को इसपर विचार करना चाहिए. कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को उत्तराधिकार के अधिकार नहीं दिए जाने के मुद्दे पर मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लिकेशन एक्ट 1937 को चुनौती देने वाली याचिका में संशोधन करने को भी कहा है.
सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण से कहा कि आप याचिका में संशोधन क्यों नहीं करते? भारतीय महिलाओं के अधिकारों के एक अहम हिस्से इसे उन्हें वंचित किया जा रहा है, यह सवाल सिर्फ 1937 के अधिनियम का नहीं है.
-भारत एक्सप्रेस
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