राजस्थान सरकार की ओर से हत्या के एक मामले में आरोपी को बरी करने के हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है. जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस प्रसन्न बी वराले की बेंच ने कहा कि केवल खून से सने हथियार की बरामदगी, जिसमें पीड़ित का खून का ग्रुप पाया गया हो, हत्या के दोष को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है.
राजस्थान सरकार ने 15 मई 2015 को हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी, जिसमें हनुमान नामक आरोपी की उम्रकैद की सजा को रद्द कर बरी किया गया था. निचली अदालत ने 10 दिसंबर 2008 को आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 100 रुपये का जुर्माना लगाया था.
मामला 1 और 2 मार्च 2007 की मध्य रात्रि को छोटे लाल की हत्या से जुड़ा है, जिसके बाद अज्ञात हमलावरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी. संदेह और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार किया गया. अभियोजन ने दावा किया कि आरोपी मृतक की पत्नी पर बुरी नजर रखता था, और उसकी निशानदेही पर बरामद हथियार पर फोरेंसिक जांच में मृतक का खून मिला. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोषमुक्ति के खिलाफ अपील में हस्तक्षेप तभी जायज है, जब साक्ष्य एकमात्र संभावित दृष्टिकोण के रूप में अपराध की ओर इशारा करें और निर्दोषता को खारिज करें. कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और राज्य सरकार की याचिका को खारिज कर दिया.
यह फैसला कानूनी साक्ष्यों की व्याख्या और दोष सिद्धि के मानकों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय भविष्य में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर निर्भर मामलों में निचली अदालतों को सतर्क करेगा. हत्या के इस मामले में अभियोजन पक्ष की कमजोर तैयारी और साक्ष्यों की कमी को कोर्ट ने प्रमुख कारण माना. यह मामला राजस्थान सरकार के लिए एक सबक हो सकता है, जहां साक्ष्य संग्रह और प्रस्तुति में सुधार की जरूरत है.
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