फर्जी विश्वविद्यालय और फर्जी डिग्री देने वाले संस्थानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपना आधिकारिक जवाब दाखिल कर दिया है. इससे पहले हाई कोर्ट ने इस गंभीर मुद्दे पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए यूजीसी सहित अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. कोर्ट ने केंद्र सरकार से भी ऐसे अवैध संस्थानों के खिलाफ प्रभावी और सख्त कार्रवाई करने को कहा था, जो मासूम छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं.
एंटी-मैलप्रैक्टिस सेल रख रहा पैनी नजर
यूजीसी ने अदालत में दाखिल अपने जवाब में स्पष्ट किया है कि फर्जी विश्वविद्यालयों पर नकेल कसने के लिए वह लगातार कड़े कदम उठा रहा है और इस पूरे मामले में आयोग की ओर से किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं हुई है. यूजीसी ने कोर्ट को बताया कि जो संस्थान ‘यूजीसी अधिनियम 1956’ की धारा 2(f) या धारा 3 के तहत कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त नहीं हैं, उन्हें ही फर्जी विश्वविद्यालय माना जाता है. ऐसे गैर-मान्यता प्राप्त संस्थानों को देश में किसी भी प्रकार की डिग्री देने या अपने नाम में ‘यूनिवर्सिटी’ (विश्वविद्यालय) शब्द का इस्तेमाल करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है.
आयोग ने आगे कहा कि फर्जी विश्वविद्यालयों की गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए उसका एंटी-मैलप्रैक्टिस सेल (Anti-Malpractice Cell) लगातार सक्रियता से काम कर रहा है. जैसे ही किसी फर्जी संस्थान की शिकायत मिलती है, उसके खिलाफ तुरंत एफआईआर (FIR) दर्ज कराई जाती है और संबंधित राज्य सरकारों को भी उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर सख्त कानूनी कार्रवाई करने को कहा जाता है.
उठाए गए कई कदम
दायर हलफनामे (Affidavit) में यूजीसी ने बताया कि वह समय-समय पर अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची को नियमित रूप से अपडेट करता है. इसके साथ ही सार्वजनिक नोटिस जारी करके छात्रों व अभिभावकों को किसी भी संस्थान में प्रवेश (एडमिशन) लेने से पहले उसकी मान्यता की गहन जांच करने की सलाह दी जाती है.
यूजीसी ने यह भी जानकारी दी कि उसने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों तथा शिक्षा विभागों को बकायदा पत्र लिखकर फर्जी विश्वविद्यालयों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई करने और स्कूलों के माध्यम से छात्रों में व्यापक जागरूकता फैलाने के निर्देश जारी किए हैं. यूजीसी का दावा है कि उसने अपने वैधानिक दायित्वों (Statutory Obligations) का पूरी तरह से पालन किया है और छात्रों के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक सभी कदम उठाए हैं.
वर्षों की मेहनत और पैसा हो रहा बर्बाद
पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात को गंभीरता से रेखांकित किया था कि छोटे शहरों और ग्रामीण कस्बों के सीधे-सादे छात्र अक्सर इन फर्जी संस्थानों के भ्रामक झांसे में आ जाते हैं. छात्र अपने जीवन के कई वर्षों की कठिन मेहनत, अमूल्य समय और गाढ़ी कमाई का पैसा खर्च करते हैं, लेकिन अंत में उन्हें ऐसी फर्जी डिग्री थमा दी जाती है, जिसका रोजगार मिलने या उच्च शिक्षा (Higher Education) में कोई वास्तविक महत्व या वैधता नहीं होती है.
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आपराधिक केस की मांग वाली जनहित याचिका
यह याचिका अधिवक्ता शशांक देव सुधि ने दायर की है. उन्होंने अपनी इस जनहित याचिका (PIL) में मुख्य रूप से यह मांग की है कि जितने भी संस्थानों को फर्जी विश्वविद्यालय घोषित किया जा चुका है, उन्हें तुरंत पूरी तरह से बंद किया जाए और उनके संचालकों के खिलाफ कड़ी आपराधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए. याचिका में यह भी दलील दी गई है कि देश में फर्जी विश्वविद्यालयों का धड़ल्ले से संचालन होना छात्रों और अभिभावकों के साथ एक बड़ा संगठित धोखा (चीटिंग) है तथा यह नागरिकों के शिक्षा और सम्मानजनक रोजगार के अधिकार का सीधा उल्लंघन भी है.
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