Raksha Bandhan 2025: श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा… भाई की कलाई पर बंधा रंगीन धागा और बहन की आंखों में दुआओं की चमक. Raksha Bandhan का ये नज़ारा हम हर साल देखते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस साधारण से दिखने वाले “रक्षा सूत्र” में ऐसी कौन-सी ताकत है, जो सदियों से इसे भारतीय परंपरा का अहम हिस्सा बनाए हुए है? इसका जवाब हमें एक बेहद रोचक पौराणिक कथा में मिलता है.
सतयुग से जुड़ी कथा
मान्यता है कि सतयुग में दैत्यों के राजा बली ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था. उनकी दानवीरता की चर्चा चारों ओर थी. इसी का परीक्षण करने के लिए भगवान विष्णु वामन अवतार में, एक बौने ब्राह्मण का रूप धरकर, बली के पास पहुंचे और तीन पग भूमि दान में मांगी.
बली ने बिना सोचे-समझे हामी भर दी. तभी वामन रूपी विष्णु ने पहला कदम बढ़ाकर पूरा आकाश नाप लिया, दूसरे कदम में धरती समेट ली. अब तीसरे कदम के लिए जगह बची नहीं, तो बली ने विनम्र होकर अपना सिर आगे कर दिया. विष्णु उनकी उदारता से प्रसन्न हुए और उन्हें पाताल लोक का साम्राज्य दे दिया (Raksha Bandhan 2025).
लक्ष्मी जी का रक्षा सूत्र
बली ने वरदान में अनुरोध किया कि भगवान विष्णु पाताल में उनके द्वारपाल बनकर रहें. विष्णु ने वचन निभाया, लेकिन जब वह लंबे समय तक बैकुंठ नहीं लौटे, तो मां लक्ष्मी उन्हें खोजते-खोजते पाताल पहुंच गईं.
वहां उन्होंने एक गरीब ब्राह्मणी का रूप धरकर राजा बली के हाथ में रक्षा सूत्र बांधा. बली ने बदले में कुछ मांगने को कहा, तो लक्ष्मी जी ने विष्णु को बैकुंठ वापस भेजने की इच्छा जताई.
राजा बली ने वचन निभाते हुए भगवान को मुक्त कर दिया. कहा जाता है कि ये घटना श्रावण पूर्णिमा के दिन हुई थी और तभी से रक्षाबंधन मनाने की परंपरा शुरू हुई.
Raksha Bandhan मंत्र का महत्व
इस दिन रक्षा सूत्र बांधते समय एक मंत्र पढ़ा जाता है– “येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः. तेन त्वाम् अभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
इसका मतलब है, जिस तरह मां लक्ष्मी ने दानवीर बली को रक्षा सूत्र बांधकर उनके जीवन में शुभता लाई, उसी तरह ये धागा भी आपकी अटूट रक्षा करे.
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-भारत एक्सप्रेस
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