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बरसाना में बदली दर्शन व्यवस्था, श्रद्धालुओं को चलना होगा 5 किमी पैदल; ‘वन-वे’ हुआ रूट

ब्रज में बरसाना की विश्वप्रसिद्ध लठामार होली के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को इस बार कठिन पैदल यात्रा का सामना करना पड़ सकता है.

ब्रज की गलियों में बरसाना की विश्वप्रसिद्ध लठामार होली का आनंद लेने आ रहे श्रद्धालुओं के लिए आस्था की डगर थोड़ी कठिन होने वाली है. प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़ को संभालने के लिए जो नया रूट तैयार किया है, उसने श्रद्धालुओं खासकर बुजुर्गों,  महिलाओं और दूर दराज से आने वाले श्रद्धालु सबसे ज्यादा चिंतित नजर आ रहे हैं.

नए ट्रैफिक और दर्शन प्लान के मुताबिक, अगर आप परिक्रमा करते हुए मंदिर पहुंचना चाहते हैं, तो आपको पूरे ब्रह्मांचल पर्वत की परिक्रमा करनी होगी. इसका मतलब है कि श्रीजी मंदिर (राधारानी मंदिर) की चौखट तक पहुंचने के लिए आपको करीब 15 किलोमीटर पैदल चलना होगा. जो लोग परिक्रमा नहीं करना चाहते, उनके लिए भी राह आसान नहीं है. उन्हें भी कम से कम 5 किलोमीटर की पैदल दूरी तय करनी ही होगी.

प्रशासन ने साफ कर दिया है कि गोपालजी मंदिर से आगे किसी भी गाड़ी को फटकने नहीं दिया जाएगा. सभी वाहन निर्धारित पार्किंग में खड़े होंगे और वहां से सिर्फ आपके पैर ही आपका सहारा होंगे.

क्या है प्रशासन का ‘वन-वे’ प्लान?

भीड़ बेकाबू न हो, इसके लिए मंदिर में एंट्री और एग्जिट का पूरा सिस्टम बदल दिया गया है. श्रद्धालुओं को राधारानी गेट से प्रवेश मिलेगा और वे पुरानी सीढ़ियों के रास्ते मंदिर तक पहुंचेंगे तथा दर्शन के बाद भक्त जयपुर मंदिर गेट से बाहर निकलेंगे और गाड़ियों वाले रास्ते (ढलान) से नीचे उतारे जाएंगे.

पारंपरिक रास्ते पर छिड़ी बहस

इस पूरी व्यवस्था में जो बात श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों को सबसे ज्यादा अखर रही है, वह है छोटी परिक्रमा का बंद होना. सालों से श्रद्धालु चिकसोली और गहवर वन जैसी पवित्र जगहों से होते हुए संकरी गलियों के रास्ते मंदिर पहुंचते थे. इसे ही पारंपरिक छोटी परिक्रमा कहा जाता है.

स्थानीय निवासियों का कहना है कि अगर प्रशासन इस छोटी परिक्रमा को गहवर वन तक खोल दे और उसे मुख्य मार्ग से जोड़ दे, तो भक्तों की दूरी 15 किलोमीटर से घटकर 13 किलोमीटर रह जाएगी. इससे न केवल बुजुर्गों को राहत मिलेगी, बल्कि भीड़ भी अलग-अलग रास्तों पर बंट जाएगी.

दूर-दराज से आने वाले भक्तों का कहना है कि आस्था अपनी जगह है, लेकिन 15 किलोमीटर की दूरी और ऊपर से पहाड़ की चढ़ाई हर किसी के बस की बात नहीं है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, सुरक्षा जरूरी है लेकिन परंपरा और सुविधा के बीच एक तालमेल होना चाहिए ताकि कोई भी भक्त बिना दर्शन किए मायूस होकर ना लौटे.

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-भारत एक्सप्रेस



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