15 जुलाई भारतीय राजनीति के इतिहास का एक अहम दिन माना जाता है. इसी दिन वर्ष 1979 में देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. यह सिर्फ एक सरकार का अंत नहीं था, बल्कि उस राजनीतिक प्रयोग की भी समाप्ति थी, जिसने पहली बार कांग्रेस के लंबे शासन को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया था.
1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल ने देश की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया. विपक्ष के कई बड़े नेताओं को जेल भेज दिया गया और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल उठने लगे. हालांकि, इसी दौर ने बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट होने का मौका भी दिया.
जब आपातकाल खत्म हुआ और 1977 में लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई, तब कई विपक्षी दलों ने अपने मतभेद भुलाकर एक साथ आने का फैसला किया. भारतीय लोक दल, जनसंघ, कांग्रेस (ओ), समाजवादी दल समेत कई छोटे राजनीतिक संगठनों ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया. इस गठबंधन का नेतृत्व वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई को सौंपा गया.
1977 का चुनाव बना ऐतिहासिक
1977 का लोकसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण चुनावों में गिना जाता है. जनता पार्टी ने 405 सीटों पर चुनाव लड़ा और 295 सीटों पर जीत हासिल कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया. वहीं कांग्रेस, जो लंबे समय से केंद्र की सत्ता पर काबिज थी, केवल 153 सीटों तक सिमट गई. जनता पार्टी का वोट शेयर 41.32 प्रतिशत रहा.
इस जीत के साथ पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी और मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. यह भारतीय लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन का एक नया अध्याय था.
सरकार ने लिए कई बड़े फैसले
मोरारजी देसाई सरकार ने सत्ता संभालने के बाद आपातकाल के दौरान हुए फैसलों और कथित दुरुपयोग की जांच शुरू कराई. प्रेस की स्वतंत्रता बहाल करने, लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने और नागरिक अधिकारों को फिर से स्थापित करने जैसे कई कदम उठाए गए. इन फैसलों को लोकतंत्र की बहाली की दिशा में महत्वपूर्ण माना गया.
लेकिन सरकार की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि उसके अपने सहयोगी दल बनने लगे.
अंदरूनी मतभेद बना सबसे बड़ी परेशानी
जनता पार्टी कई अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों का गठबंधन थी. समाजवादी नेताओं, पूर्व जनसंघ के नेताओं और कांग्रेस (ओ) के नेताओं के बीच कई मुद्दों पर लगातार मतभेद सामने आने लगे. नीतियों के साथ-साथ नेतृत्व को लेकर भी खींचतान बढ़ती गई.
चारण सिंह, जगजीवन राम, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में राजनीतिक संतुलन बनाए रखना आसान नहीं था. इसके अलावा, जनसंघ से जुड़े नेताओं की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सदस्यता को लेकर उठा ‘दोहरी सदस्यता’ का विवाद भी सरकार के लिए बड़ी मुश्किल बन गया.
ढाई साल में बिखर गया राजनीतिक प्रयोग
आखिरकार 1979 में हालात ऐसे बने कि चौधरी चारण सिंह ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया. बहुमत खोने के बाद मोरारजी देसाई ने 15 जुलाई 1979 को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. इसके साथ ही देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार गिर गई.
बाद में चारण सिंह प्रधानमंत्री तो बने, लेकिन वे भी संसद में बहुमत साबित नहीं कर सके. इसके बाद 1980 में हुए लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की कांग्रेस ने जोरदार वापसी की. जनता पार्टी सिर्फ 31 सीटों पर सिमट गई और उसका वोट शेयर घटकर करीब 19.97 प्रतिशत रह गया.
हालांकि जनता पार्टी का प्रयोग लंबे समय तक नहीं चल सका, लेकिन इसका असर भारतीय राजनीति पर गहरा पड़ा. इसने यह साबित कर दिया कि कांग्रेस को चुनाव में हराया जा सकता है और विपक्षी दल एकजुट होकर सत्ता तक पहुंच सकते हैं.
आने वाले वर्षों में 1989, 1996 और बाद के कई चुनावों में गठबंधन राजनीति का दौर मजबूत हुआ. जनता पार्टी के विघटन के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भी अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई और आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति की प्रमुख ताकत बनकर उभरी.
जनता पार्टी की कहानी सिर्फ एक सरकार के बनने और गिरने की कहानी नहीं है. यह इस बात का भी उदाहरण है कि केवल किसी एक दल के विरोध के आधार पर बना गठबंधन लंबे समय तक टिक नहीं सकता. मजबूत नेतृत्व, साझा सोच और स्पष्ट संगठनात्मक ढांचे के बिना सत्ता चलाना मुश्किल हो जाता है.
ये भी पढ़ें: अहमदाबाद एयर इंडिया विमान हादसा: सुप्रीम कोर्ट में AAIB का हलफनामा, अक्टूबर तक आएगी फाइनल रिपोर्ट
Also Follow Bharat Express on Youtube
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

