5 सितंबर 1986 की सुबह कराची का जिन्ना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बाकी दिनों की तरह ही था. पैन अमेरिकन वर्ल्ड एयरवेज यानी पैन एम की फ्लाइट 73 मुंबई से न्यूयॉर्क के सफर पर थी और कराची उसका एक पड़ाव था. विमान में करीब 360 यात्री और 19 क्रू सदस्य मौजूद थे. लेकिन कुछ ही देर में यह सफर एक ऐसे भयावह घटनाक्रम में बदल गया, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया.
विमान में चार हथियारबंद आतंकवादी घुस आए और उन्होंने फ्लाइट को हाईजैक कर लिया. उस समय विमान की सीनियर फ्लाइट पर्सर थीं 22 साल की नीरजा भनोट. हालात बेहद खतरनाक थे, लेकिन नीरजा ने घबराने के बजाय तुरंत समझ लिया कि यात्रियों को बचाने के लिए क्या करना जरूरी है.
उन्होंने कॉकपिट तक हाईजैक का संकेत पहुंचाया. इसकी वजह से पायलट और दूसरे कॉकपिट क्रू सदस्य विमान से बाहर निकलने में कामयाब रहे. विमान के उड़ान भरने की संभावना खत्म हो गई और आतंकवादी अंदर फंस गए यात्रियों पर नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश करने लगे.
अमेरिकी यात्रियों को बचाने के लिए छिपाए पासपोर्ट
आतंकवादियों की खास नजर अमेरिकी यात्रियों पर थी. नीरजा और बाकी क्रू सदस्यों ने अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छिपाने शुरू कर दिए. कुछ पासपोर्ट कूड़ेदान में डाल दिए गए, ताकि आतंकवादियों को यह पता न चल सके कि विमान में कौन-कौन से अमेरिकी नागरिक मौजूद हैं.
करीब 17 घंटे तक विमान जमीन पर खड़ा रहा. इस दौरान यात्रियों के लिए हर मिनट डर और अनिश्चितता से भरा था. आखिरकार जब विमान की बिजली चली गई, तो स्थिति अचानक और ज्यादा खतरनाक हो गई. अंधेरे का फायदा उठाकर आतंकवादियों ने गोलीबारी शुरू कर दी.
इसी अफरा-तफरी के बीच नीरजा ने इमरजेंसी गेट खोल दिया. उनके सामने मौका था कि वह खुद सबसे पहले विमान से बाहर निकल जाएं. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने यात्रियों को बाहर निकलने में मदद करना शुरू किया.
नीरजा ने बच्चों समेत कई यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकलने में मदद की. इसी दौरान वह आतंकवादियों की गोली का निशाना बन गईं. तीन बच्चों को बचाने की कोशिश करते हुए उन्हें गोली मार दी गई. गंभीर रूप से घायल नीरजा को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी.
इस घटना में 20 लोगों की मौत हुई. हालांकि, नीरजा की सूझबूझ और साहस के कारण सैकड़ों यात्री सुरक्षित बच पाए.
पत्रकार के घर जन्मी थीं नीरजा
नीरजा भनोट का जन्म 7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ में हुआ था. उनके पिता हरीश भनोट पत्रकार थे और मां रमा भनोट. परिवार में नीरजा को प्यार से ‘लाडो’ कहा जाता था.
मुंबई में पढ़ाई पूरी करने के बाद नीरजा ने मॉडलिंग की दुनिया में भी कदम रखा. वर्ष 1985 में उनका चयन पैन अमेरिकन एयरलाइंस में फ्लाइट अटेंडेंट के तौर पर हुआ. अपने काम के प्रति उनकी गंभीरता और जिम्मेदारी ने उन्हें जल्द ही सीनियर फ्लाइट पर्सर के पद तक पहुंचा दिया.
किसी ने शायद नहीं सोचा होगा कि नौकरी शुरू करने के महज कुछ समय बाद ही नीरजा को ऐसी परीक्षा से गुजरना पड़ेगा, जिसमें उनके सामने अपनी जिंदगी और सैकड़ों अनजान लोगों की जिंदगी के बीच चुनाव जैसा कठिन सवाल खड़ा होगा.
उन्होंने अपना फैसला कर दिया था.
देश और दुनिया ने किया सम्मान
नीरजा भनोट की बहादुरी को भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में सम्मान मिला. भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया. वह इस सम्मान को पाने वाली पहली महिला और सबसे कम उम्र की प्राप्तकर्ताओं में शामिल हुईं.
पाकिस्तान ने भी उनकी बहादुरी को मान्यता देते हुए उन्हें ‘तमगा-ए-इंसानियत’ से सम्मानित किया. अमेरिका में भी उनकी बहादुरी के लिए उन्हें कई सम्मान मिले.
बाद के वर्षों में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया और मुंबई में एक चौक का नाम भी उनके नाम पर रखा गया. उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे, इसके लिए उनके जीवन पर आधारित फिल्म ‘नीरजा’ 2016 में रिलीज हुई. सोनम कपूर ने फिल्म में नीरजा की भूमिका निभाई.
उनके परिवार ने नीरजा भनोट पैन एम ट्रस्ट की भी स्थापना की. यह ट्रस्ट बहादुरी दिखाने वाले विमान चालक दल के सदस्यों और सामाजिक अन्याय का सामना करने वाली महिलाओं को सम्मानित करता है.
नीरजा की कहानी आज भी क्यों याद आती है?
नीरजा भनोट की कहानी सिर्फ एक विमान अपहरण की कहानी नहीं है. यह उस साहस की मिसाल है, जिसमें एक युवा महिला ने अपनी सुरक्षा से पहले दूसरों की जिंदगी को रखा.
22 साल की उम्र में उन्होंने ऐसा फैसला लिया, जिसकी कल्पना करना भी आसान नहीं है. उनके पास खुद को बचाने का रास्ता था, लेकिन उन्होंने यात्रियों को अकेला नहीं छोड़ा.
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-भारत एक्सप्रेस
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