भारतीय रंगमंच की अनूठी दास्तान को बयां करता ‘मंच प्रवेश’: Book Review
27 मार्च को दुनिया भर में विश्व रंगमंच दिवस मनाया जा रहा है. इस मौके पर राजकमल प्रकाशन से आई फैसल अलकाजी की किताब 'मंच प्रवेश' चर्चा के केंद्र में है.
1940 के दशक में पारसी समुदाय को ईरान में पुनर्वासित करने का प्रस्ताव क्यों कभी अमल में नहीं आया
1947 में भारत की आज़ादी के समय, ईरान के कुछ अखबारों और ज़ोरोएस्ट्रियन नेताओं ने एक विचार रखा कि भारत में बसे पारसी समुदाय को उनकी ‘पितृभूमि’ ईरान वापस बुलाया जाए.
कौन थीं अन्ना मणि? जिन्होंने मौसम विज्ञान को आत्मनिर्भर बनाया
अन्ना मणि, जिन्हें 'भारत की वेदर वुमन' कहा जाता है, मौसम विज्ञान और ओजोन अध्ययन में अग्रणी थीं. उन्होंने भारत में मौसम उपकरणों का विकास किया और ओजोनसोंडे जैसे उपकरण तैयार किए.
फांसी के फंदे से ठीक पहले भगत सिंह के आखिरी शब्द; ‘मेरे भगत सिंह’ ने खोले अनछुए राज | Book Review
अमर शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की 95वीं बरसी पर पंकज चतुर्वेदी की नई किताब ‘मेरे भगत सिंह’ चर्चा में है. यह किताब भगत सिंह को केवल एक क्रांतिकारी नायक के रूप में नहीं, बल्कि लाहौर के उस घर के एक लाडले बेटे और जेल की कोठरी में गहन दर्शन पर बहस करने वाले एक प्रखर विद्वान के रूप में पेश करती है.
पानी का शाप या कुप्रबंधन का परिणाम? बिहार की त्रासद विरासत पर डॉ. दिनेश कुमार मिश्र का बड़ा खुलासा
बिहार में पानी कभी सिर्फ जीवन का स्रोत नहीं रहा, वह एक विरोधाभास है जहां एक ही समय में बाढ़ और सुखाड़ दोनों मौजूद रहते हैं. यह प्रकृति का दोष नहीं, बल्कि हमारी नीतियों और समझ की सीमाओं का परिणाम है.
‘यह जो बिहार है’ और ‘हमर चंपारण’- बिहार की आत्मा और इतिहास के गहन चिंतन को उकेरती अरविंद मोहन की पुस्तकें
बिहार को समझना दरअसल भारत की उस आत्मा को समझना है, जो तर्क करती है, सवाल पूछती है और हर स्थापित सत्य को चुनौती देती है. यहां ‘मैं’ का स्थान ‘हम’ ने ले लिया है. यह सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि एक सोच है.
बिहार दिवस पर विशेष: बिहार की बौद्धिक विरासत का जीवंत दस्तावेज है ‘नालंदा’
आज बिहार अपना स्थापना दिवस मना रहा है. इस अवसर पर पेंगुइन स्वदेश द्वारा प्रकाशित अभय के. की पुस्तक "नालंदा: विश्व चेतना का उद्गम स्थल" के जरिए जानिए उस महान विश्वविद्यालय के उत्थान, पतन और फिर से जीवित होने की पूरी कहानी.
21 मार्च 1977: भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत और एक काले अध्याय का अंत
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 21 मार्च 1977 एक ऐसी तारीख है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता. यह वही दिन था जब देश ने 21 महीनों तक चले आपातकाल के अंधेरे से बाहर निकलकर फिर से आज़ादी की सांस ली.
विश्व वन दिवस पर कबीर संजय की ‘जंगलमन की डायरी’, प्रकृति के साथ एक जीवंत संवाद
जंगलमन की डायरी एक संवेदनशील डायरी-शैली की कृति है, जिसमें कबीर संजय प्रकृति, बचपन की यादों, जंगलों और मानव-प्रकृति संबंधों के टूटते रिश्ते को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करते हैं. यह पुस्तक पर्यावरण चेतना, डिजिटल डिटॉक्स और वन संरक्षण का गहरा संदेश देती है.
‘पंख दिए आकाश न दोगे’; महाकवि कन्हैयालाल सेठिया की कविताओं में छिपी है आत्मनिर्भरता की गूंज | Book Review
आज विश्व कविता दिवस पर याद करते हैं राजस्थान के उस जनकवि को, जिनकी पंक्तियों में रेगिस्तान की तपन भी है और संवेदना की ठंडी छांव भी. पेंगुइन स्वदेश द्वारा प्रकाशित कन्हैयालाल सेठिया के प्रतिनिधि संग्रह 'पंख दिए आकाश न दोगे' की विशेष समीक्षा, जो हमें स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की नई उड़ान सिखाती है.







