बिहार की मिट्टी, संस्कृति और यहां के गौरवशाली इतिहास को अपनी कविताओं में जगह देने वाले वरिष्ठ कवि-गीतकार सत्यनारायण अब हमारे बीच नहीं रहे. उनके निधन के साथ बिहार ने साहित्य की दुनिया का एक ऐसा नाम खो दिया, जिसकी पहचान सिर्फ एक कवि के तौर पर नहीं, बल्कि अपनी धरती की आवाज को शब्द देने वाले रचनाकार के रूप में भी थी.
13 सितंबर 1935 को भोजपुर जिले के कौलोडिहरी गांव में जन्मे सत्यनारायण ने लंबा साहित्यिक जीवन जिया. कदमकुआं स्थित अपने घर की चारदीवारी में उनका मन काफी समय से बेचैन था. आखिरकार उनकी यह बेचैनी हमेशा के लिए थम गई.
सत्यनारायण की सबसे बड़ी पहचान बिहार के राजकीय गीत ‘मेरे भारत के कंठहार, तुझको शत-शत वंदन बिहार’ से बनी. इस गीत में उन्होंने बिहार के इतिहास, संस्कृति, महापुरुषों और गौरव को बेहद सरल और भावपूर्ण शब्दों में पिरोया.
मार्च 2012 में इस रचना को बिहार के आधिकारिक राज्य गीत के रूप में स्वीकार किया गया. गीत को संगीत देने का काम पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और पंडित शिवकुमार शर्मा ने किया था. आज भी स्कूलों, सरकारी आयोजनों और बिहार दिवस जैसे मौकों पर यह गीत सुनाई देता है.
कैसे चुना गया राज्यगीत?
राज्यगीत बनने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है. वर्ष 2012 बिहार की स्थापना के 100 साल पूरे होने का अवसर था. इसी दौरान सरकार ने राज्यगीत और प्रार्थना गीत के लिए लोगों से रचनाएं मांगीं. करीब दो हजार रचनाएं सरकार तक पहुंचीं.
उस समय सत्यनारायण ओपन हार्ट सर्जरी के बाद रांची में अपने बेटे के पास रह रहे थे. पटना से उनके मित्र अभय राज ने उन्हें इस बारे में जानकारी दी. परिवार के सदस्यों ने भी उन्हें गीत लिखने के लिए प्रेरित किया. इसके बाद उन्होंने गीत तैयार किया और डाक के जरिए अपनी रचना सरकार को भेज दी.
चयन समिति में सुरेंद्र स्निग्ध, अरुण कमल और रवींद्र राजहंस शामिल थे. समिति ने तीन रचनाओं को अंतिम दौर के लिए चुना. बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सत्यनारायण की रचना को बिहार के राज्यगीत के रूप में चुना.
इसके बाद उन्हें बिहार हिंदी प्रगति समिति का अध्यक्ष बनाया गया. करीब छह वर्षों तक उन्होंने दो कार्यकाल में इस जिम्मेदारी को संभाला. उन्होंने नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलगीत की रचना भी की.
आंदोलन से लेकर सरकारी सेवा तक
सत्यनारायण का साहित्यिक सफर सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहा. वर्ष 1974 के जयप्रकाश नारायण आंदोलन के दौरान वे ‘नुक्कड़ कवि’ के रूप में भी चर्चित हुए. उनकी कविताओं में आम लोगों की आवाज और सामाजिक आंदोलनों की बेचैनी साफ दिखाई देती थी.
उन्होंने इतिहास में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने के साथ बीएल की डिग्री भी हासिल की. शुरुआती दौर में अध्यापन से जुड़े और बाद में बिहार सरकार की सेवा में आए. 1990 के दशक में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका साहित्यिक सफर जारी रहा.
उनकी रचनाओं के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले. इनमें गोपाल सिंह नेपाली पुरस्कार, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान, नागार्जुन सम्मान, रमण साहित्य पुरस्कार और भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार जैसे सम्मान शामिल हैं. उनके कई काव्य-संग्रह और नवगीत भी प्रकाशित हुए.
अधूरी रह गई एक आखिरी इच्छा
सत्यनारायण के जीवन की एक इच्छा अब अधूरी रह गई. 13 सितंबर 2026 को उनके 92वें जन्मदिन के मौके पर बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन परिसर में ‘सत्यनारायण समग्र’ के विमोचन और उनके सम्मान में समारोह आयोजित करने की तैयारी थी. इस पुस्तक में उनकी संपूर्ण रचनाओं को एक जगह संकलित किया जाना था. लेकिन इससे पहले ही उनका निधन हो गया.
सत्यनारायण भले ही दुनिया से विदा हो गए हों, लेकिन उनकी आवाज बिहार के लोगों के बीच लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी. उनका राज्यगीत बिहार की पहचान और गौरव का हिस्सा बन चुका है. उनकी कविताओं में दर्ज बिहार की मिट्टी, संस्कृति और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचते रहेंगे.
ये भी पढ़ें- मिडिल ईस्ट संकट के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, अप्रैल-जून तिमाही में 7.8% की शानदार बढ़त
Also Follow Bharat Express on Youtube
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



