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ईरान को तो मिल गया… लेकिन अमेरिका के हाथ क्या आया? क्या ट्रंप के लिए अब युद्धविराम ही जीत का नया पैमाना बन गया है?

मिडिल ईस्ट तनाव के बीच अमेरिका-ईरान युद्धविराम पर सवाल उठ रहे हैं, ट्रंप की रणनीति को ‘पीछे हटने’ के तौर पर देखा जा रहा है. ईरान की शर्तें मानने के आरोपों के बीच अमेरिका में भी ट्रंप की नेतृत्व क्षमता पर बहस तेज हो गई है…

Trump Iran ceasefire controversy Middle East: डोनाल्ड ट्रंप की जिस ‘सनक’ ने पूरे मिडल-ईस्ट को बारूद के ढेर पर बिठा दिया था, उसका अंत फिलहाल एक ऐसे युद्धविराम से हुआ है जो अमेरिका की जीत कम और ‘पैर पीछे खींचने’ की कवायद ज्यादा लग रहा है. जिस ईरान की ‘सभ्यता’ को मिटाने की कसम ट्रंप ने सार्वजनिक मंचों से खाई थी, आज उसी ईरान की इस जिद के आगे व्हाइट हाउस बेबस दिख रहा है कि होर्मुज स्ट्रेट पर तेहरान का ‘अधिकार’ होगा.

दरअसल जिस मुद्दे पर ट्रंप ने 13 हजार हमले किए, अगर अंत में वही शर्तें माननी थीं, तो इस 40 दिन के खूनी खेल में गंवाई गई अरबों की संपत्ति और हजारों जानों का हिसाब कौन देगा? ऐसा लगता है कि ट्रंप ने युद्ध जीतने के बजाय सिर्फ अपनी ‘इज्जत’ बचाने के लिए सीजफायर का रास्ता चुना है.

ट्रंप को खोखले दावे करने की पुरानी आदत

आपको बताते चलें कि ट्रंप का यह अंदाज नया नहीं है. यह उनके उस पुराने ‘पैटर्न’ की याद दिलाता है जब उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर का दावा कर खुद को ‘शांति का मसीहा’ साबित करने की खूब शेखी बघारी थी. तब भी ट्रंप ने कूटनीतिक जीत के ऐसे ही ऊंचे-ऊंचे दावे किए थे जिनका जमीन पर कोई ठोस असर नहीं दिखा.

यही नहीं आज भी वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख का नाम लेकर अपनी साख बचाने की जुगत में हैं. ट्रंप के लिए शायद अब जीत का मतलब युद्ध का अंत नहीं, बल्कि किसी तरह ‘सीजफायर’ कराकर खुद को संकटमोचक घोषित कर देना ही रह गया है, भले ही इसके लिए उन्हें दुश्मन की हर शर्त पर दस्तखत क्यों न करने पड़ें.

अब अपनों के बीच ही घिरे ट्रंप

बता दें कि ट्रंप के इस यू-टर्न ने अमेरिका के भीतर भी भूचाल ला दिया है. जिस राष्ट्रपति ने ‘सिविलाइजेशन’ खत्म करने की बात कही थी, उनके इस अचानक पीछे हटने को कमजोरी के रूप में देखा जा रहा है. विपक्षी डेमोक्रेट्स ने तो हमला बोला ही है लेकिन ट्रंप के अपने खेमे के नेता जैसे ऑस्टिन स्कॉट और रॉन जॉनसन भी उनकी ‘धमकी’ और फिर ‘नरमी’ की आलोचना कर रहे हैं. इसके साथ ही अमेरिकी संसद में उन्हें पद से हटाने के लिए ‘आर्टिकल-25’ की चर्चा फिर से तेज हो गई है. लोग सवाल उठा रहे हैं कि जो राष्ट्रपति अपनी बातों पर टिक नहीं सकता, वह दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश का नेतृत्व कैसे करेगा?

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इस्लामाबाद की मेज पर खाली हाथ अमेरिका?

पाकिस्तान ने शुक्रवार को होने वाले ‘इस्लामाबाद समझौते’ के लिए न्योता तो भेज दिया गया है लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिका ने चुपके से ईरान के उन 10 बिंदुओं को स्वीकार कर लिया है जो तेहरान की बड़ी जीत है. इसमें प्रतिबंध हटाना और युद्ध के नुकसान का मुआवजा देना जैसे मुद्दे शामिल हैं. यानी ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ वाली नीति अब ‘मैक्सिमम कंसेशन’ (ज्यादा रियायत) में बदल चुकी है.

वहीं बाजार में भले ही तेल की कीमतें कम होने से कुछ देर की शांति दिखे, लेकिन कूटनीति के तराजू पर ईरान ने होर्मुज से ‘टोल वसूलने’ का अपना हक मनवाकर अमेरिका को बैकफुट पर धकेल दिया है. ट्रंप के लिए अब शेखी बघारने को सिर्फ एक कागज का टुकड़ा है जबकि ईरान ने अपना प्रभाव और सत्ता दोनों बरकरार रखी है.

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-भारत एक्सप्रेस



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