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झुका नहीं, संभला है भारत; चाबहार पर अमेरिकी पाबंदियों के बीच मोदी सरकार का बड़ा दांव, अब नहीं रुकेगी विकास की रफ्तार

साल 2026-27 के बजट में चाबहार पोर्ट के लिए ₹0 आवंटित किए जाने ने कूटनीति और विदेश नीति में हलचल मचा दी है. यह भारत के लिए रणनीतिक महत्व का प्रोजेक्ट था, जो पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट और मध्य एशिया तक पहुंच का विकल्प प्रदान करता है.

जब भी बजट आता है, तो आम तौर पर हम और आप यही हिसाब लगाते हैं कि इस बार क्या सस्ता हुआ और क्या महंगा? मोबाइल के दाम गिरेंगे या नहीं? मेरी सैलरी पर टैक्स कितना कटेगा? लेकिन इस भारी-भरकम बजट की फाइलों में कुछ ऐसी भी चीजें छिपी होती हैं, जिन पर सिर्फ हमारी नहीं, बल्कि पूरी दुनिया और खासकर हमारे पड़ोसियों की पैनी नजर होती है.

इस बार का यानी साल 2026-27 का बजट जब पेश हुआ, तो एक ऐसी खबर सामने आई जिसने कूटनीति और विदेश नीति के गलियारों में हलचल मचा दी है. भारत सरकार ने अपना ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ कहा जाने वाले ईरान के चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) के लिए इस बार बजट में ‘शून्य’ यानी ₹0 आवंटित किया हैं. जिस प्रोजेक्ट के लिए पिछले सालों में सैकड़ों करोड़ रुपये रखा जाता था, उसके सामने अब सन्नाटा है.

क्या चाबहार का सपना टूट गया?

चाबहार पोर्ट भारत के लिए सिर्फ एक बंदरगाह नहीं, बल्कि एक बड़ा रणनीतिक दांव था. इसे पाकिस्तान के ‘ग्वादर पोर्ट’ (जहां चीन बैठा है) के जवाब के तौर पर देखा जाता था. भारत इसके जरिए बिना पाकिस्तान गए, सीधे ईरान के रास्ते अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच सकता था. अटल बिहारी वाजपेयी के समय से शुरू हुआ यह सपना मोदी सरकार तक आते-आते हकीकत बनने लगा था. 2016 में तो पीएम मोदी खुद ईरान गए थे और इसे अफगानिस्तान की ‘लाइफलाइन’ बताया गया था.

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर प्रतिबंध लगा रखा हैं. पहले ट्रंप ने भारत को मजबूर किया कि वह ईरान से सस्ता तेल लेना बंद करे. फिर 2025 में रूस से तेल लेने पर भी दबाव बनाया. अब मामला चाबहार तक पहुंच गया है.

अमेरिका ने चाबहार पोर्ट के लिए जो ‘विशेष छूट’ दे रखी थी, उसे सितंबर 2025 में खत्म करने का ऐलान कर दिया गया. भारत को अपनी बोरिया-बिस्तर समेटने के लिए 6 महीने का वक्त मिला, जो 26 अप्रैल 2026 को खत्म हो रहा है. यानी अब से करीब दो महीने बाद भारत को वहां से हटना पड़ सकता है.

बजट में ‘0’ का मतलब क्या है?

बजट में चाबहार के सामने ‘जीरो’ लिखा होना कोई तकनीकी गलती नहीं है. जानकारों की मानें तो यह भारत का एक ‘साइलेंट मैसेज’ है कि वह फिलहाल अमेरिका से पंगा लेने के मूड में नहीं है. कोई भी भारतीय कंपनी या बैंक अमेरिकी प्रतिबंधों (Sanctions) की आंच नहीं झेलना चाहता है.

जब पत्रकारों ने सरकार से पूछा कि क्या हम चाबहार छोड़ रहे हैं, तो सरकार ने कहा “बातचीत चल रही है, स्थिति जटिल है.” लेकिन बजट के आंकड़े सच बयां कर रहे हैं. जहां एक तरफ भारत पीछे हट रहा है, वहीं चीन अपनी जगह बनाने की फिराक में है, क्योंकि उसे अमेरिकी पाबंदियों की परवाह नहीं है.

अब तेल कहां से आएगा?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कह दिया कि भारत अब वेनेजुएला से तेल खरीदेगा. हालांकि पीएम मोदी और वेनेजुएला के नेताओं के बीच बातचीत हुई थी, लेकिन इसका खुलासा ट्रंप के बयान से हुआ है.

ये भी पढ़ें: ट्रंप की धमकियों के बीच सीरियल धमाकों से दहला ईरान! 4 शहरों में बिछीं लाशें, तेहरान की सड़कों पर मचा कोहराम

-भारत एक्सप्रेस



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