दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि राजधानी में यमुना नदी का जलस्तर सीमा अधिक हो गया है. इसके पुनरुद्धार और पुनर्जीविन में किसी तरह का मानवीय या सहानुभूतिपूर्ण विचारों की आड़ में हस्तक्षेप को उचित नहीं ठहराया जा सकता है. जस्टिस धर्मेश शर्मा ने यह बात दिल्ली 2021 के मास्टर प्लान के जोन ओ यानी यमुना बाढ़ क्षेत्र में आने वाले यमुना खादर के क्षेत्र में काम करने वाली नर्सरी कल्याण एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए कही.
बुल्डोजर से सभी पौधों को तोड़ने के खिलफ याचिका दाखिल
एसोसिएशन दिल्ली विकास प्राधिकरण की ओर से उनकी नर्सरी को उखाड़ने और बुल्डोजर से सभी पौधों को तोड़ने के खिलफ याचिका दाखिल की थी. उसने कहा था कि डीडीए उसे अपना पक्ष रखने का कोई अवसर दिए बिना वर्ष 2019 में अभियान चलाया था, जो उचित नही है. जस्टिस ने कहा कि इसी तरह का कोई भी हस्तक्षेप केवल सार्वजनिक परियोजनाओं के समय पर क्रियान्वयन में बाधा डालेगी और उसमें देरी करेगा. उन्होंने यह कहते हुए एसोसिएशन की याचिका को खारिज कर दिया.
कोर्ट ने कही ये बात
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता संबंधित भूमि पर अपने दावे को लेकर कोई आधार पेश नहीं किया है. उसका पर्यावरण के संरक्षण होने का दावा करने का प्रयास तुच्छ है. उसने कोई सबूत भी पेश नहीं किया जो बताए कि वह जमीन पर कब्जा जारी रखने का हकदार है या पुनर्वास का हकदार है. हरित अधिकरण ने भी अपने कई आदेशों में कहा है कि यमुना के डूब क्षेत्र में निर्माण, कब्जा या निवास की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. साथ ही यमुना के डूब क्षेत्र की प्राकृतिक विशेषताओं और परिस्थितिकी को बनाए रखना डीडीए का कर्तव्य है. संबंधित भूमि जोन ओ में आता है. सुप्रीम कोर्ट और हरित अधिकरण के फैसलों के अनुसार जनहित में उसे अतिक्रमण से मुक्त किया जाना आवश्यक है.
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