सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों को वोटिंग का अधिकार देने संबंधी याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. सीजेआई बी आर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने यह नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा है, इसलिए इसपर सरकार को विस्तृत स्पष्टीकरण देना होगा.
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि यह मामला देश के करीब 4.5 लाख विचाराधीन कैदियों से जुड़ा है. उन्होंने कहा कि यह याचिका उन कैदियों के अधिकारों को लेकर है जो अभी दोषी नहीं ठहराए गए हैं, बल्कि सिर्फ मुकदमे का इंतजार कर रहे है.
विचाराधीन कैदियों को वोट देने की याचिका
यह याचिका सुनीता शर्मा की ओर से दायर की गई है. दायर याचिका में कहा गया है कि लगभग 4.5 लाख कैदी देशभर के 1330 जेलों में बंद है. इनमें से 75 फीसदी विचाराधीन है. इनमें से कई लोग वर्षो से मुकदमे लंबित रहने के कारण जेल में बंद है. दायर याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले का हवाला दिया है, जिसमें मतदान के अधिकार को संवैधानिक अधिकार दिया गया था.
याचिका में कहा गया है कि विचाराधीन कैदियों को मतदान से वंचित करना लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है. उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया में ऐसा संपूर्ण प्रतिबंध नही है. दायर याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 62 (5) को चुनौती दी गई है.
याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कहा भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां हर नागरिक को शासन चुनने का समान अधिकार दिया गया है. उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 326 में स्पष्ट कहा गया है कि हर वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार है.
दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी विचाराधीन और प्री ट्रायल कैदियों को वोट देने का अधिकार दिया गया है.
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-भारत एक्सप्रेस
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