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बुलडोजर कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट सख्त! बरेली मामले में ‘यथास्थिति’ का आदेश, अधिकारियों को ‘मनमाने तरीके’ से काम ना करने की चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने बरेली में बुलडोजर कार्रवाई पर एक सप्ताह के लिए रोक लगा दी है. याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उनके आवास और मैरेज हॉल परिसर पर बिना नोटिस के कार्रवाई की जा रही है.

सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने बरेली में की जा रही बुलडोजर की कार्रवाई पर एक सप्ताह के लिए रोक लगा दिया है. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने दावा किया कि विना नोटिस के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जा रही है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है. हालांकि कोर्ट ने अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका पर आगे की सुनवाई से इनकार करते हुए हाई कोर्ट जाने को कहा है.

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील रउफ रहीम ने कहा कि उनके आवास, मैरेज हॉल परिसर पर बिना किसी नोटिस के कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हर ध्वस्तीकरण मामले में सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करना सही नही है. कोर्ट ने कहा कि यदि 13 नवंबर को बुलडोजर को लेकर दिए गए फैसले का उल्लंघन हुआ है, तो पीड़ित हाई कोर्ट जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश

याचिकाकर्ता ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में लिस्टिंग में कम से कम 10 दिन का समय लगेगा. इसपर जस्टिस विक्रमनाथ ने असहमति जताते हुए कहा कि हाई कोर्ट तत्कालिता को ध्यान में रखते हुए कई बार उसी दिन सुनवाई कर देता है. दायर याचिका में मांग की गई थी कि ध्वस्त किए गए हिस्से की पुनर्स्थापना की जाए, या वैकल्पिक रूप से मुआवजा दिया जाए, ध्वस्तीकरण से जुड़े रिकॉर्ड तलब किए जाए साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों की जांच शुरू की जाए. 13 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिशा निर्देश जारी किया था. कोर्ट ने कहा था कि बुलडोजर एक्शन को लेकर कम से कम 15 दिन की मोहलत दी जानी चाहिए. नोडल अधिकारी को 15 दिन पहले नोटिस भेजना होगा. कोर्ट ने नोटिस को डिजिटल पोर्टल पर भी डालने को कहा है. कोर्ट ने तीन महीने के भीतर पोर्टल बनाने को कहा है. कोर्ट ने कहा कि कानून की प्रक्रिया का पालन जरूरी है. सत्ता का दुरुपयोग बर्दास्त नही होगा.

मनमाने तरीके से घर तोड़ने पर कोर्ट ने फटकारा

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि अधिकारी अदालत की तरह काम नही कर सकते हैं. प्रशासन जज नही हो सकता है. किसी की छत छीन लेना उसके मौलिक अधिकारों का हनन है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा था कि सिर्फ आरोप के आधार पर किसी के घर को नही तोड़ा जा सकता है. कोर्ट ने यह भी कहा था कि किसी का घर उसका सपना होता है कि उसका आश्रय कभी न छीने और हर घर का सपना होता है कि उसके पास आश्रय हो. हमारे सामने सवाल यह है कि क्या कार्यपालिका किसी व्यक्ति का आश्रय छीन सकती है जिसपर अपराध का आरोप है.

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बुलडोजर एक्शन का मनमाना रवैया बर्दास्त नही होगा. अधिकारी मनमाने तरीके से कम नही कर सकते. अगर किसी मामले में आरोपी एक है तो घर तोड़कर पूरे परिवार को सजा क्यों दी जाए? पूरे परिवार से उनका घर नही छीना जा सकता.

बता दें कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में हुए बुलडोजर की कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दोषी होने के बावजूद उसके घर को नही गिराया जा सकता है. कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक सड़को पर, वॉटर बॉडी या रेलवे लाइन की जमीन पर अतिक्रमण से बने मंदिर, मस्जिद या दरगाह है तो उसे जाना होगा. क्योंकि पब्लिक ऑर्डर सर्वोपरि है.

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-भारत एक्सप्रेस



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