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Republic Day 1975: ना तालियां, ना रियायत, किरण बेदी ने हक से बदला इतिहास

26 साल की उम्र में किरण बेदी ने लिंगभेद के खिलाफ खड़े होकर इतिहास रच दिया. 26 जनवरी 1975 को उन्होंने गणतंत्र दिवस परेड में दिल्ली पुलिस की पूरी पुरुष टुकड़ी का नेतृत्व किया और साबित कर दिया कि नेतृत्व जेंडर नहीं, हौसले से तय होता है.

Republic Day Parade 1975 First Woman IPS India Kiran Bedi
Edited by Vaibhav Gupta

26 साल की उम्र में किरण बेदी तालियों या प्रशंसा की नहीं, बल्कि न्याय और बराबरी की तलाश में थीं. 1975 में, भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी के रूप में दिल्ली पुलिस में तैनात किरण बेदी उस समय एकमात्र महिला अधिकारी थीं. गणतंत्र दिवस परेड के लिए दिल्ली पुलिस कंटिंजेंट के नेतृत्व का फैसला हो रहा था, लेकिन उन्हें चुना नहीं गया, क्योंकि वे एक महिला थीं. ट्रेनिंग, अनुशासन या क्षमता में कोई कमी नहीं थी, फिर भी लिंग के आधार पर उन्हें पीछे रखा गया.

नहीं मानी हार

उन्होंने हार नहीं मानी. अपने तत्कालीन आईजीपी पी.आर. राजगोपाल से सीधे मिलकर सवाल किया:
“सर, मुझे परेड का नेतृत्व क्यों नहीं दिया जा रहा है?”

संदेह जताया गया कि क्या एक महिला 14 किलोमीटर से ज्यादा की परेड बिना रुके, तलवार हाथ में लिए, पूरी तरह पुरुषों वाली टुकड़ी का नेतृत्व कर पाएगी?

किरण बेदी का जवाब दृढ़ और तथ्यपूर्ण था. उन्होंने अपने 70 पुरुष साथियों के साथ ही ट्रेनिंग ली थी, वही कठिन ड्रिल्स पूरी की थीं, वही शारीरिक परीक्षाएं पास की थीं. अब और कितनी बार खुद को साबित करना पड़ेगा, जो पहले ही साबित हो चुका है?

उनकी जिद और योग्यता के आगे झुकना पड़ा. अनुमति मिल गई.

26 जनवरी 1975 बना गवाह

दिल्ली की ठंडी हवाओं और घने कोहरे में राजपथ (कर्तव्य) पथ पर उन्होंने अथक अभ्यास शुरू किया. बूट पहने, तलवार थामे, रोज-रोज घंटों रिहर्सल. हर कदम में चुपके का विद्रोह था, हर दोहराव में नई ताकत जुड़ रही थी.

26 जनवरी 1975 को गणतंत्र दिवस परेड में इतिहास रचा गया. किरण बेदी ने आगे बढ़कर दिल्ली पुलिस की पूरी पुरुष टुकड़ी का नेतृत्व किया. वे भारत की पहली महिला बनीं, जिन्होंने गणतंत्र दिवस परेड में किसी कंटिंजेंट (विशेषकर ऑल-मेल पुलिस कंटिंजेंट) का नेतृत्व किया.

सिर्फ परेड नहीं, एक संदेश

यह महज एक परेड नहीं थी, बल्कि एक संदेश था. हर उस महिला के लिए, जिसे उसकी क्षमता पर सवाल उठाए जाते हैं, जिसे कम आँका जाता है. किरण बेदी ने साबित कर दिया कि नेतृत्व जेंडर से नहीं, मेहनत, हिम्मत और न्याय की लड़ाई से तय होता है.

50 साल बाद भी उनकी यह उपलब्धि लाखों महिलाओं को प्रेरित करती है.

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-भारत एक्सप्रेस



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