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Book Review: आज विश्व कविता दिवस (World Poetry Day) है, एक ऐसा अवसर जब हम कविता की उस शक्ति को याद करते हैं जो शब्दों से परे जाकर हृदय को छूती है, समाज को जागृत करती है और जीवन को अर्थ प्रदान करती है. इसी अवसर पर पेंगुइन स्वदेश द्वारा हाल ही में प्रकाशित (जनवरी 2026) महाकवि कन्हैयालाल सेठिया (Poet Kanhaiyalal Sethia) के प्रतिनिधि काव्य-संग्रह “पंख दिए आकाश न दोगे” की चर्चा करना उचित होगा. यह संग्रह न केवल सेठिया जी की साहित्यिक यात्रा का एक सुंदर प्रतिबिंब है, बल्कि हिंदी-राजस्थानी साहित्य की लोक-आत्मा को समेटे हुए एक जीवंत दस्तावेज भी है.
संग्रह “पंख दिए आकाश न दोगे” की बात करते हुए एक उनकी प्रसिद्ध रचना का उल्लेख करना उचित होगा. यह संग्रह उनकी प्रतिनिधि कविताओं का संकलन है, जिसमें स्वाभिमान, संघर्ष और आत्म-निर्भरता का संदेश प्रमुखता से उभरता है.
संग्रह का शीर्षक ही एक कविता से लिया गया है, जो पाठकों को प्रेरित करती है कि जीवन में क्षमता (पंख) तो मिली है, लेकिन ऊंचाइयां हासिल करने के लिए स्वयं प्रयास करना होगा. यहां इस कविता का एक अंश (जैसा कि विभिन्न स्रोतों और उनके गायन/पाठ में उपलब्ध है) प्रस्तुत है:
पंख दिए आकाश न दोगे
पंख दिए आकाश न दोगे,
उड़ान तेरी अपनी होगी.
सपनों की ऊंचाई छू लेना,
परिश्रम तेरी अपनी होगी.
(पूर्ण कविता में कवि जीवन की चुनौतियों, स्वतंत्रता और आत्म-शक्ति पर जोर देते हैं. ये एक प्रेरक गीत की तरह है, जिसे अक्सर गाया भी जाता है.)
इसके अलावा, सेठिया जी की एक अन्य अमर रचना जो संग्रह में संभावित रूप से शामिल है और उनकी लोकप्रियता का प्रतीक है-“धरती धोरां री” (राजस्थान की वंदना). इसका एक छोटा अंश:
धरती धोरां री!
आ तो सुरगां नै सरमावै,
ईं पर देव रमण नै आवै,
ईं रो जस नर नारी गावै,
धरती धोरां री!
ये कविता राजस्थान की मिट्टी, उसके संघर्ष और गौरव को इतने जीवंत ढंग से चित्रित करती है कि लाखों लोग इसे गाते हैं.
ये दोनों रचनाएं संग्रह की भावना को साकार करती हैं. एक ओर आत्म-उत्थान का संदेश (“पंख दिए आकाश न दोगे”), दूसरी ओर लोक-जीवन और देशप्रेम की गहराई (“धरती धोरां री”).
इन सेठिया जी की इन पंक्तियों को याद करते हुए कह सकते हैं: कविता पंख है, जो हमें उड़ना सिखाती है, पर उड़ान हमारी अपनी मेहनत से पूरी होती है.
कवि का परिचय और संग्रह की पृष्ठभूमि
कन्हैयालाल सेठिया (1919-2008) राजस्थान के जनकवि के रूप में विख्यात हैं. स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी, समाजसेवा और साहित्य सृजन, तीनों क्षेत्रों में उनका योगदान अविस्मरणीय है. उनकी कविताएं रेगिस्तान की तपती बालू से निकलकर भी मनुष्य की अटूट आस्था और संवेदना की ठंडी छाया प्रदान करती हैं. यह संग्रह पेंगुइन स्वदेश (पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया) द्वारा लगभग 216 पृष्ठों में प्रकाशित हुआ है, जिसमें उनकी चुनिंदा और प्रतिनिधि रचनाएं संकलित हैं. शीर्षक ही कवि की जीवन-दृष्टि को उद्घाटित करता है. “पंख दिए आकाश न दोगे” अर्थात् पंख तो दिए हैं, पर आकाश की ऊंचाई तुम्हें स्वयं छूनी होगी. यह संघर्ष, स्वाभिमान और आत्म-निर्भरता का संदेश है.
संग्रह की प्रमुख विशेषताएं
लोक की आत्मा से उपजी कविताएं
सेठिया जी की भाषा सहज, बोलचाल वाली और लोक-सुगंध से परिपूर्ण है. राजस्थानी लोक-जीवन, रेगिस्तान की कठोरता, प्रकृति की सुंदरता और मानवीय संवेदनाओं का चित्रण इतना जीवंत है कि पाठक स्वयं को थार की रेत में खड़ा महसूस करता है.
विषय-वस्तु की विविधता
देशप्रेम की मुखर आवाज, स्वतंत्रता और स्वाभिमान की चेतना, सामाजिक अन्याय के विरुद्ध विद्रोह, मानवीय करुणा और प्रकृति-प्रेम, सब कुछ इस संग्रह में संतुलित रूप से मौजूद है. यह प्रेरक काव्यकृति है जो पाठक में संघर्ष करने की शक्ति भर देती है.
भाषा और शैली
सरल लेकिन गहन. शब्द ऐसे चुने गए हैं जो सीधे हृदय तक पहुंचते हैं. कविता उनके लिए मात्र शब्द नहीं, जीवन का संगीत है. ये वाक्य संग्रह की आत्मा को व्यक्त करता है.
समकालीन प्रासंगिकता
आज के दौर में जब लोग ऊंचाइयों की चाह में पंख भूल जाते हैं, यह संग्रह याद दिलाता है कि आकाश बाहर नहीं, भीतर की उड़ान से मिलता है.
समग्र मूल्यांकन
“पंख दिए आकाश न दोगे” एक ऐसा संकलन है जो पुरानी पीढ़ी की स्मृतियों को ताजा करता है और नई पीढ़ी को प्रेरित करता है. यह महाकवि सेठिया की विरासत को नए पाठकों तक पहुंचाने का सराहनीय प्रयास है. यदि आप हिंदी कविता के प्रेमी हैं, राजस्थान की लोक-संस्कृति से जुड़ाव महसूस करते हैं या बस जीवन में कुछ प्रेरणा की तलाश में हैं तो ये पुस्तक आपके लिए है.
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-भारत एक्सप्रेस
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