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विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार




भारत एक्सप्रेस


27 मई 1977 को बिहार के पटना जिले के बेलछी गांव में एक भयावह जातीय नरसंहार हुआ, जिसमें 11 लोगों की हत्या कर दी गई थी. इस घटना में मुख्य रूप से दलित और पिछड़े समुदायों को निशाना बनाया गया.

'राष्ट्रीय युवा संसद गोवा 2026' ने यह साबित किया कि आज का युवा केवल देश का भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान की सक्रिय शक्ति भी है. गोवा विश्वविद्यालय में 23 और 24 मई 2026 को आयोजित इस दो दिवसीय कार्यक्रम में देश के 16 राज्यों से आए युवाओं ने लोकतंत्र, संसदीय परंपराओं और नीति निर्माण जैसे विषयों पर अपने विचार रखे.

बिहार की लोकसंगीत परंपरा को समर्पित प्रख्यात लोकगायक और संगीतकार भरत सिंह भारती को पद्म श्री सम्मान से नवाज़ा गया है.

रास बिहारी बोस उन महान क्रांतिकारियों में थे, जिन्होंने विदेश में रहकर भी भारत की आजादी की लड़ाई को नई दिशा दी. जापान में रहते हुए उन्होंने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग और आजाद हिंद फौज की नींव रखी.

भारतीय कुश्ती को नई पहचान देने वाले गुरु हनुमान आज भी खेल जगत में प्रेरणा का सबसे बड़ा नाम माने जाते हैं. राजस्थान के एक साधारण परिवार से निकलकर उन्होंने दिल्ली में ऐसा अखाड़ा खड़ा किया, जिसने देश को कई अंतरराष्ट्रीय पहलवान दिए.

Nagarwala Bank Scam 1971: 24 मई 1971 को इंदिरा गांधी की आवाज में आई एक फर्जी फोन कॉल पर एसबीआई से ₹60 लाख गायब किए. आरोपी कैप्टन नागरवाला की गिरफ्तारी, फिर रहस्यमयी मौतों और जांच आयोगों के बावजूद, 5 दशक बाद भी मामला भारतीय इतिहास का अनसुलझा रहस्य बना है.

23 मई 1984 का दिन भारतीय इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा, जब उत्तराखंड की बेटी बछेंद्री पाल ने माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर तिरंगा फहराया और भारत की पहली महिला एवरेस्ट विजेता बनीं.

महारानी गायत्री देवी ने महलों की आरामदायक जिंदगी छोड़कर समाज में बदलाव की मिसाल कायम की है. उन्होंने लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए MGD स्कूल की स्थापना की, महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाई और राजनीति से लेकर ग्रामीण विकास तक सक्रिय भूमिका निभाई.

China Tibet Conflict: 1950 में सैन्य आक्रमण और दबावपूर्ण '17 सूत्री समझौते' के जरिए चीन ने तिब्बत की स्वतंत्रता को खत्म कर उसे अपना हिस्सा बना लिया. इस घटना के बाद 1959 में हुए विद्रोह ने दलाई लामा को भारत में शरण लेने पर मजबूर किया, जिससे यह मुद्दा आज भी एक अंतरराष्ट्रीय विवाद बना हुआ है.

भारत में आज 'आत्मनिर्भरता' और 'लोकल के लिए वोकल' जैसे नारे खूब सुनाई देते हैं. लेकिन क्या सिर्फ आर्थिक और राजनीतिक आज़ादी ही काफी है? क्या हमारी सोच, हमारा ज्ञान और दुनिया को देखने का तरीका भी पूरी तरह आज़ाद हो पाया है? इसी बड़े और असहज सवाल को सामने लाती है अभय कुमार दुबे की नई किताब ‘उपनिवेशवाद का अलौकिक साम्राज्य’.