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कलम की ताकत ने बंदूकों को किया शांत, गया के ‘मगध सुपर 30’ ने कैसे बदली नक्सल प्रभावित इलाके की तकदीर

खान सर और कोचिंग संस्थाओं को लेकर जारी बहस के बीच, बिहार कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी अभयानंद की आत्मकथा ‘असीम’ का यह अंश ‘सुपर-30’ की शुरुआत की एक अलग कहानी सामने लाता है. इसमें अभयानंद बताते हैं कि किस तरह आनंद कुमार के साथ मिलकर उन्होंने आर्थिक रूप से वंचित लेकिन मेधावी छात्रों के लिए इस पहल की नींव रखी थी. आज जब कोचिंग संस्थानों की भूमिका और उनके सामाजिक प्रभाव पर सवाल उठ रहे हैं, तब ‘सुपर-30’ की इस शुरुआती यात्रा को उसके सह-संस्थापक की नज़र से पढ़ना दिलचस्प भी है और प्रासंगिक भी.

पटना के एक अंग्रेज़ी दैनिक अख़बार के सम्पादक के कमरे में, मेरी पहली मुलाक़ात हुई आनंद कुमार नाम के एक नौजवान से. आनंद सामान्य संसाधनों वाला व्यक्ति मालूम पड़ता था, जो अपने एक कोचिंग सेंटर में गणित पढ़ाकर रोज़ी-रोटी कमा रहा था. कोचिंग सेंटर का नाम था रामानुजम स्कूल ऑफ़ मैथेमेटिक्स.

हमारा परिचय हुआ और आनंद मुझे अक्सर मेरे ऑफ़िस तथा निवास पर मिलने आने लगा. हमारी चर्चा गणित के इर्द-गिर्द घूमती थी. उसके कोचिंग केन्द्र में जाकर मुझे फ़िज़िक्स पढ़ाने का अवसर मिला. एक कक्षा में पढ़ाने का सुखद अनुभव, जिसकी मेरे मन में बहुत दिनों से तमन्ना थी परन्तु पहले कभी कर नहीं पाया था, वह पूर्ण हुई.

अपने शुरुआती दिनों से ही, मुझे यह स्पष्ट हो चुका था कि शिक्षा ही निर्धन को धन दिला सकती है. मन में सदा से, समाज के प्रति एक कृतज्ञता की भावना भी थी. समाज के इस ऋण को चुकाने का एक रास्ता दिखने लगा.
अपने बच्चों को आईआईटी के लिए पढ़ाने के बाद, मन में कुछ आत्मविश्वास पैदा हुआ था. मैंने निर्णय लिया कि ग़रीब मेधावी बच्चों को आईआईटी की तैयारी करवाने का एक प्रयोग किया जाए. मैंने आनंद कुमार की मदद ली और उसके कोचिंग की कक्षा में से तीस ऐसे बच्चों का चयन किया. यही कहानी है सुपर 30 के जन्म की.

आनंद ने गणित की ज़िम्मेदारी ली और मैंने फ़िज़िक्स की. प्रतिदिन, काम के बाद मैं इन्हें पढ़ाने जाता था. केमिस्ट्री का कोई शिक्षक नहीं था. हम सोच में पड़ गए कि एक पूरे विषय को पढ़ाने वाला कोई है ही नहीं, तो आईआईटी की तैयारी कैसे हो पाएगी? मगर बच्चों के उत्साह के आगे यह समस्या फीकी पड़ गई. मैंने जैसे-जैसे उन तीस बच्चों के साथ समय बिताना शुरू किया, मुझे स्पष्ट होने लगा कि इनकी मेधा को हमारे अन्दर के शिक्षक की आवश्यकता नहीं थी, बल्कि इन्हें एक प्रेरक की ज़रूरत थी. यह बच्चे, आपस में पढ़ाई के विषयों पर घंटों चर्चाएँ करते थे, एक-दूसरे से सीखते थे. इनमें कुछ कर दिखाने का एक जुनून था.

शहर से दूर, एक ऐसे कोने में कक्षा चलाई जा रही थी जहाँ तक पक्की सड़क भी नहीं पहुँच पाई थी. अपनी गाड़ी से उतरकर, वहाँ तक जाने के लिए, अन्तिम सौ गज़ की दूरी मुझे अपने नाक पर रूमाल रखकर तय करनी पड़ती थी. मेरे मन में, उन बच्चों को पढ़ाने और उन्हें सफलता तक ले जाने की एक धुन सवार हो गई थी.

शिक्षण के दौरान नए प्रयोगों को मिला अवसर

प्रथम वर्ष के परिणाम अच्छे आए, अधिकतर बच्चों का चयन हो गया मगर रैंक उतने सन्तोषजनक नहीं थे. मैं न तो पेशे से शिक्षक था न ही मैंने उस क्षेत्र में कोई प्रशिक्षण लिया था. इस बात का फ़ायदा और नुकसान दोनों हुए. शिक्षण में, मुझे अपने कई नये दृष्टिकोण पर प्रयोग करने का अवसर मिला. क्रमशः बतौर शिक्षक अपनी कमियों का भी एहसास होने लगा और समझ में आने लगा कि पढ़ाने की कैसी पद्धति सबसे कारगर होगी. मैं स्वयं को उस ढाँचे में ढालने लग गया.
2003 से 2005 तक की यात्रा में, परिणाम प्रतिवर्ष बेहतर होते गए. बिहार के कोचिंग जगत में खलबली मच गई. घर-घर में सुपर 30 की चर्चा होने लगी.

उसी अन्तराल में, 2005 में बिहार का ऐतिहासिक चुनाव हुआ जिसमें वर्षों पुरानी सरकार बदल गई. नई सरकार ने मुझे बीच मंच पर लाकर खड़ा कर दिया और मेरे कन्धों पर बहुत अहम ज़िम्मेदारियाँ सौंप दीं. मेरे पढ़ाने का समय छीना जाने लगा. पहले तीन वर्षों की भाँति, मैं सुपर 30 की दैनिक गतिविधियों पर ध्यान देने में असमर्थ होने लगा. वहीं इन तीन वर्षों में, सुपर 30 की वजह से, आनंद कुमार के कोचिंग केन्द्र की लोकप्रियता आकाश चूमने लगी. आनंद के जीवन में इसका आर्थिक सुप्रभाव दिखने लगा था.
2006 में पहली बार अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया को इस प्रयोग की भनक लगी और उन्हें इसके बारे में और जानने की उत्सुकता हुई. मैंने सुपर 30 के आर्थिक रख-रखाव में कभी झाँककर भी नहीं देखा था. वह पूरी तरह से आनंद के ज़िम्मे था. मेरा योगदान सिर्फ़ और सिर्फ़ बच्चों की पढ़ाई में था. मेरे मस्तिष्क में, सुपर 30, समाज के हित के लिए एक प्रयोग था, मैंने उसे कभी आय के साधन के रूप में देखा ही नहीं.

वर्ष 2007 में, मेरी समझ में आने लगा कि सुपर 30 जिस स्वप्न को देखकर बनाया गया था, उसकी वास्तविकता अब बदलने लगी थी. मैं यूँ कहूँगा कि पेशे और पसन्द के बीच की जंग ही इस दिशान्तर का कारण बनी. आनंद के लिए पढ़ाना एक पेशा था, और मेरे लिए एक जज़्बा. जो स्वप्न मैंने देखा था, वह शायद आनंद की प्राथमिकताओं से कोसों दूर था. जब इन दोनों का संयोग कठिन होने लगा, मैंने आनंद कुमार से अलग होने का निर्णय ले लिया. उस वर्ष सुपर 30 के सफल बच्चों के सम्मान समारोह में, जिसमें माननीय मुख्यमंत्री मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे, मैंने जाने से मना कर दिया. आनंद कुमार के साथ मेरी अन्तिम सार्वजनिक मुलाक़ात, बंबई में रिलायंस उद्योग द्वारा आयोजित ‘रीयल हीरोज़’ नामक एक पुरस्कार समारोह में हुई थी.
मेरे अलग हो जाने के बाद, नये वेषों में, यह प्रयोग आगे बढ़ने लगा. कई लोग जो समाज के लिए कुछ करना चाहते थे, भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से, समाज के हर कोने से मेरे पास आने लगे. हर एक बच्चा जो इस प्रयोग से लाभान्वित हुआ, वह शिक्षा की शक्ति का ज्वलंत दीपक है.

जीवन में भटकाव का अनुभव होने लगा

2008 में, मेरे पढ़ाने का सिलसिला लगभग समाप्त हो चुका था. ऐसा लगने लगा था मानो मैं जीवन के पथ पर कहीं भटक गया हूँ. तभी एक दिन, मेरे एक जानकार ने मुझे सूचना दी कि मौलाना वली रहमानी नाम के एक सज्जन मुझसे किसी ज़रूरी काम से मिलने को इच्छुक हैं. मैंने उन्हें मुलाक़ात का समय तय करने को कह दिया. सफ़ेद लिबास और लम्बी सफ़ेद लहराती हुई दाढ़ी में, शान्त मुख वाले मौलाना मेरे ऑफ़िस के कमरे में मुझसे मिलने आए. उन्हें देखकर ही एक सकारात्मक ऊर्जा का एहसास हुआ. उन्होंने अपना अनुरोध रखा. उनका कहना था कि उन्होंने मुझे ग़रीब बच्चों के जीवन को शिक्षा के माध्यम से सँवारते देखा है और वे चाहते हैं कि मैं उनके समुदाय के बच्चों की भी मदद करूँ. उन्हें आभास था कि इन बच्चों का शिक्षा से अलगाव था, ख़ासकर गणित और विज्ञान जैसे विषयों में. जिस निश्छलता से उन्होंने अपनी बात रखी, मैं मना नहीं कर पाया. मुझे स्वयं भी बहुत प्रसन्नता हुई.

अकल्पनीय तत्परता के परिणामस्वरूप, कुछ ही दिनों में ‘रहमानी 30’ के सभी बन्दोबस्त हो गए और उसे शुरू भी कर दिया गया. मैं देखकर हैरान रह गया. मौलाना मूलतः एक राजनीतिज्ञ थे और मेरा कार्यक्षेत्र राजनीतिज्ञों के बहुत समीप था. बतौर डी.जी.पी., मुझे राज्य के महत्त्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी भी थी.

बावजूद इसके, उनके साथ के मेरे एक दशक के सम्पर्क में, उन्होंने मेरे स्वभाव का सम्मान रखते हुए, मुझसे कभी किसी प्रकार की राजनीतिक चर्चा नहीं की. ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे.
आज, रहमानी 30 अपनी एक अलग पहचान बना चुका है. अपने समुदाय में, शिक्षा का वह कल्पवृक्ष बन चुका है जिसने कई बच्चों के जीवन को दिशा दी है. बिना सरकार के आगे हाथ फैलाए, उन्होंने अपनी समस्या का समाधान स्वयं निकाल लिया. रहमानी 30 के बच्चे देश-विदेश की कई प्रतियोगिताओं में आगे बढ़ रहे हैं, बिना किसी रियायत के.

मेरे गृह ज़िले गया के निवासियों ने माँग रखी कि वहाँ के ग़रीब बच्चों का भी कल्याण होना चाहिए. इस प्रयास का नेतृत्व डालमिया नाम के एक व्यापारी ने किया. उम्र अधिक होने के कारण, उनकी अपनी समस्याएँ थीं. उनके पास धन की कोई कमी तो नहीं थी, मगर फिर भी उन्होंने समाज से माँग-माँग कर संसाधन जुटाए. उनका सिद्धान्त था, ‘समाज के द्वारा, समाज के लिए’. हमारी सोच मिलने लगी और ‘मगध सुपर 30’ का जन्म हुआ.

पंकज कुमार नाम के एक स्थानीय पत्रकार ने इस प्रयास के संचालन का दायित्व उठा लिया. मगध सुपर 30 के सभी बच्चे इन्हें पिता-तुल्य मानते हैं. डालमिया तो देवलोक में विलीन हो चुके हैं, परन्तु उनके इस प्रयास ने एक अमिट छाप छोड़ी है. मगध सुपर 30 हमारे प्राचीन काल की गुरुकुल परम्परा का उदाहरण है. गया, जिसकी गणना नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में की जाती है, उस क्षेत्र के लोगों में प्रतिवर्ष एक हर्ष का संचार होता है. एक दशक से लोग देख रहे हैं कि लड़के-लड़कियाँ मगध सुपर 30 से पढ़कर सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय संस्थानों में दाख़िला पा रहे हैं. उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में मौलिक परिवर्तन आया है. वहाँ के लोगों की सोच में बदलाव आया है. उनका झुकाव अब क़लम की ओर हुआ है, बन्दूक़ से दूरी बढ़ी है.

गेल अध्यक्ष का अनुरोध लेकर पहुंचे एस.के. शाही

इस बदलाव में सरकार का योगदान प्रायः शून्य है, और समाज का शत प्रतिशत. एस.के. शाही दिल्ली में सी.एस.आर.एल. के नाम से एक ग़ैरसरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) चला रहे थे. वर्ष 2009 में वह मेरे पास एक प्रस्ताव लेकर आए कि वे गैस अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड अर्थात गेल के अन्तर्गत, कानपुर में एक सुपर 30 शुरू करना चाहते हैं. अपने साथ वे गेल के अध्यक्ष महोदय का अनुरोध भी लेकर आए थे. मैंने सोचा, यह भी आज़माया जाए और अपनी स्वीकृति दे दी. गेल के बोर्ड ने मुझसे सीधे सवाल किये. वे जानना चाहते थे कि सुपर 30 क्या है और उसमें मेरी क्या भूमिका होगी. मेरी समझ में आ गया कि सम्भवतः वह परखना चाहते हैं कि सुपर 30 क्या सचमुच एक चमत्कार है जैसाकि उन्होंने पिछले एक वर्ष से कहानियों के माध्यम से सुन रखा था. मैंने भी शब्दों का कोई जाल नहीं बुना, न ही कोई पारियों की कहानी सुनाई. सुपर 30 को लेकर मेरा जो अपना सपना था, उसी को खोलकर उनके सामने रख दिया. साथ ही साथ यह भी स्पष्ट कर दिया कि मेरा सम्बन्ध केवल पढ़ाई तक ही सीमित रहेगा. न मुझे उनसे पैसों की उम्मीद है और न ही मैं उनकी आर्थिक अथवा प्रशासनिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करना चाहूँगा. मुझसे बात करने के बाद, बोर्ड के सदस्य और उत्साहित हो उठे. उन्हें लगने लगा कि सुपर 30 से जुड़ी सभी मिथ्याओं को वे भंग करने जा रहे हैं.

कोरोना के कई वर्ष पूर्व, ऑनलाइन क्लास लेने का अनुभव मैंने कर लिया था. मैं पटना में रहकर, कानपुर सुपर 30 के बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाया करता था और लम्बी छुट्टियों में वहाँ जाया भी करता था. सी.एस.आर.एल. सुपर 30 की शृंखला में यह पहला सुपर 30 था. इसके बाद और कितने ही ऐसे सुपर 30 शुरू हुए, अब मुझे गिनती भी याद नहीं है. और भी अनेक पी.एस.यू. संस्थाएँ कानपुर सुपर 30 के परिणामों से प्रभावित होकर, अपनी-अपनी गुज़ारिश लेकर मेरे समक्ष आईं. उन सबके साथ भी मेरा वही सम्बन्ध बना—पढ़ाने का. देश के नक़्शे पर न जाने कितने ही ऐसे सुपर 30 चलाए जा रहे थे. इन बगीचों में सींचे हुए फूल, विश्व-भर को सुगन्धित कर रहे हैं.
यह सिलसिला आज भी जारी है. मैं दूर से ही इसे फलते-फूलते देखता हूँ.

वर्ष 2010 में अचानक बिहार सरकार को अंडमान सरकार की एक चिट्ठी आई. उनका अनुरोध था कि मैं अंडमान के बच्चों के लिए एक सुपर 30 स्थापित करने में उनकी सहायता करूँ. मुझे बहुत अधिक प्रसन्नता हुई. कुछ ही दिनों में बिहार सरकार ने एक पत्र भेजकर मुझसे सफ़ाई माँगी कि मैं सुपर 30 का कार्य बिना सरकार की अनुमति लिये कैसे कर रहा हूँ? मैं दंग रह गया. माननीय मुख्यमंत्री, पूर्व में सुपर 30 के सार्वजनिक समारोहों का हिस्सा रह चुके थे. उन्हें इस गतिविधि के बारे में सब कुछ मालूम था. मैंने उस पत्र पर अपना औपचारिक उत्तर लिखकर भेज दिया, ‘मुझे बच्चों को गणित और फ़िज़िक्स पढ़ाने के लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं है. मैं यह काम अपने ख़ाली समय में करता हूँ और न ही इससे मेरी कोई आमदनी है.’ बात वहीं दब गई मगर मुझे समझ में आ गया कि सेवा में रहते हुए, मैं इस काम को किसी बड़े पैमाने पर नहीं कर पाऊँगा.

सुपर 30 की कहानी हर व्यक्ति ने अपने ढंग से लिखी और सुनाई है. कुछ लोग हैं जो आज भी इसकी सच्चाई को समझने के प्रयास में पटना आते हैं. इनमें से कुछ उसे अपनाना भी चाहते हैं. जिन परियोजनाओं की नीयत साफ़ होती है, उन्हें सफलता मिलती है और जो इसमें अपना स्वार्थ ढूँढ़ना चाहते हैं, उनके प्रयास अनायास ही बिखर जाते हैं.

न मेरे पास इतना धन है कि मैं सुपर 30 को एक संस्था के रूप में चला सकूँ और न ही मैं इतना निर्धन हूँ कि मुझे इससे धन कमाने की आवश्यकता हो. यही कारण है कि इन सभी प्रयासों से मेरा सम्बन्ध अवित्तीय रहा है. मेरा मानना है कि सुपर 30 एक ‘सॉफ़्टवेयर’ है जो मैं निःशुल्क किसी को भी दे सकता हूँ. यदि उस व्यक्ति के पास इस सॉफ़्टवेयर को चलाने के लिए पर्याप्त ‘हार्डवेयर’ है तो वह बेशक इसे चला सकता है. अनुभव के साथ, उनकी मशीनरी परिपक्व होती जाएगी और उन्हें देखकर, समाज में कहीं एक और सुपर 30 जन्म ले लेगा. हुआ भी यही. देश का शायद ही कोई कोना है जहाँ कम से कम एक सुपर 30 नहीं हो. ग़रीब मेधावी बच्चों के जीवन में शिक्षा का दीपक प्रज्वलित कर, यह सभी मेरे सपनों को सच कर रहे हैं. इस पथ पर आते-जाते, मेरे कई सहयात्री बन चुके हैं.

सुपर 30 की लोकप्रियता बढ़ने के साथ अंतर्राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित हुआ

सुपर 30 की सर्वप्रथम आकृति की लोकप्रियता जैसे-जैसे बढ़ने लगी, मैंने देखा कि एक नई बात होने लगी थी. अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया को सुपर 30 में दिलचस्पी हुई. वे भारत आकर, पटना के उन तंग गलियारों में जाकर, इसे समझना चाहते थे. मेरे मन में प्रश्न उठने लगा—ऐसी कई संस्थाएँ हैं जो बच्चों को आईआईटी की पढ़ाई करवाती हैं, कई ऐसी भी संस्थाएँ हैं जो ग़रीब बच्चों को निःशुल्क पढ़ाती हैं, फिर सुपर 30 में ऐसी क्या बात थी जिसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया?
मैंने पत्रकारिता की किताबें पढ़ीं. सीखा कि ‘समाचार’ क्या होता है? यदि एक कुत्ता किसी व्यक्ति को काटे, तो उसमें कोई असामान्य बात नहीं है, परन्तु यदि कोई व्यक्ति एक कुत्ते को काट ले, तब वह समाचार की संज्ञा ले लेता है. ठीक यही हुआ था वर्ष 2003 से 2007 के बीच. एक गणित के शिक्षक का गणित पढ़ाना, कोई बड़ी बात नहीं थी. किसी कोचिंग संस्था का अपने छात्रों के आईआईटी में उत्तीर्ण होने के लिए सभी प्रकार के संसाधनों की उपलब्धि कराना भी कोई अजूबा नहीं था. सुपर 30 की जो बात लोगों को नायाब लगने लगी थी, वह थी बिहार जैसे राज्य में, एक वरीय पुलिस पदाधिकारी का समय निकाल कर बच्चों को पढ़ाना, वह भी इस उद्देश्य से कि शिक्षा के माध्यम से समाज में परिवर्तन की एक बयार बहे. ऐसा सम्भवतः समाज ने पहले कभी नहीं देखा या सुना था. इंसान के कुत्ते को काटने वाली बात हो गई थी.

प्रथम कुछ वर्षों में सुपर 30 के आईआईटी के परिणाम बहुत अव्वल दर्ज़े के नहीं थे. देश की अनेकों कोचिंग संस्थाएँ उससे कहीं बेहतर परिणामों का दावा कर रही थीं. ‘टॉप कॉप विद ए चाक’ वाली बात ने सुपर 30 को सबों से इतर कर दिया. शायद इसी वजह से 2008 के आसपास, प्रथम सुपर 30 से मेरे अलग होने के बाद, अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया की भी इस विषय में रुचि प्रायः समाप्त ही हो गई. कुछ वर्षों तक सुपर 30 के उस स्वरूप को गति मिली मगर अन्ततः वह गाड़ी बन्द पड़ ही गई. दुर्भाग्य है कि देश के किसी व्यक्ति अथवा संस्था ने उस सुपर 30 के ऊँचे दावों का कभी सत्यापन नहीं किया. न ही किसी ने उसकी गहराइयों में झाँककर देखने का प्रयास किया. पारदर्शिता शून्य हो चुकी थी और देखते ही देखते उस कहानी का एक स्वाभाविक अन्त हो गया. परन्तु सुपर 30 जिस प्रयोग का नाम था, वह इस शक्ल का मोहताज नहीं था. उस प्रयोग के पीछे का मूल तत्त्व शाश्वत है और रहेगा.

कई लोग मुझसे पूछते हैं कि मैंने सुपर 30 की परिकल्पना क्यों की? मुझे उसकी प्रेरणा कहाँ से मिली? उत्तर अत्यन्त सरल है—स्वान्तः सुखाय.

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-भारत एक्सप्रेस 



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