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‘साठ पार के सुपरस्टार’: रिटायरमेंट के अवसाद से निकलने और दूसरी पारी को जीने का मैन्युअल

विजय सिंह की पुस्तक “साठ पार के सुपरस्टार” रिटायरमेंट के बाद सक्रिय और सकारात्मक जीवन जीने का मंत्र देती है. अखबार बेचने से लेकर नेशनल सेल्स हेड तक का सफर तय करने वाले लेखक ने अपनी इस किताब में बताया है कि कैसे 60 के बाद की ‘बोनस उम्र’ को एक सुपरस्टार की तरह जिया जा सकता है.

Saath Paar Ke Superstar Vijay Singh Book Review
Edited by Vaibhav Gupta

विजय सिंह की पुस्तक “साठ पार के सुपरस्टार” केवल एक किताब नहीं, बल्कि जीवन के उस पड़ाव पर एक प्रेरणादायी मार्गदर्शिका है जहां समाज अक्सर व्यक्ति को “बूढ़ा” या “असक्रिय” मानकर अलग-थलग कर देता है. यह पुस्तक उस मानसिकता के विरुद्ध एक सशक्त विमर्श है जो 60 वर्ष की उम्र को जीवन की समाप्ति-रेखा समझ लेती है. लेखक सिद्ध करते हैं कि उम्र महज एक संख्या है. असली कसौटी सकारात्मक सोच, ऊर्जा, उद्देश्य और निरंतर सक्रियता की होती है. लेखक विजय सिंह का जीवन स्वयं इस संदेश का सबसे बड़ा प्रमाण है.

अखबार बेचने से हिन्दुस्तान के सेल्स हेड तक

बिहार के समस्तीपुर जिले के पतेलिया गांव में 23 फरवरी 1961 को जन्मे विजय सिंह ने ग्रामीण परिवेश से निकलकर प्रयागराज में शिक्षा प्राप्त की. पढ़ाई के दौरान अखबार बेचने (हॉकर) से शुरुआत की, फिर कमीशन एजेंट बने और कड़ी मेहनत से ‘हिन्दुस्तान’ जैसे प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक के नेशनल सेल्स हेड तक पहुंचे. उनकी पहली पुस्तक “हॉकर से हाकिम” में इस 38 वर्षों की अखबारी यात्रा का वर्णन है. 48 वर्ष की उम्र में एमबीए पूरा करना उनके आजीवन सीखने की ललक को दर्शाता है. रिटायरमेंट के बाद भी उन्होंने अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाया और अब यह दूसरी पुस्तक लिखकर दूसरों को प्रेरित कर रहे हैं.

व्यावहारिक समाधानों को छूती किताब

पुस्तक महज 84 पृष्ठों की है, लेकिन इसमें 18 अध्याय हैं जो रिटायरमेंट के बाद की चुनौतियों और उनके व्यावहारिक समाधानों को बखूबी छूते हैं. अध्याय जैसे “60 वर्ष के बाद बोनस की उम्र”, “फंड मैनेजमेंट”, “स्वास्थ्य प्रबंधन”, “दिनचर्या”, “सेवानिवृत्ति के बाद समाज के दुश्मनों से बचें”, “फ्यूज बल्ब जैसे अध्याय” (नकारात्मक लोगों और अवसाद से बचाव), “साठा तो पाठा” (नई पीढ़ी से सीखना), “अधूरे ख्वाबों को पूरा करें”, “वसीयत” और “जीवन के अंतिम समय की प्लानिंग” पाठक को आत्ममंथन के लिए मजबूर करते हैं.

‘पत्नी सबसे अच्छी दोस्त’ पर पूरा अध्याय

लेखक अपनी पत्नी मीना जी के सकारात्मक सहयोग को भावुकता से याद करते हैं. इसमें एक पूरा अध्याय “आपकी पत्नी आपकी सबसे अच्छी दोस्त” दांपत्य संबंधों की गहराई को रेखांकित करता है. उनकी 400 पुस्तकों की निजी लाइब्रेरी और उन्हें दान करने का प्रसंग पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर चिंता जताता है. महिलाओं को पुरुषों से अधिक सक्रिय और खुश बताना भी पुस्तक का एक सकारात्मक पहलू है. विदेश यात्राओं से मिले अनुभव भी लेखक ने साझा किए हैं.

पॉजिटिव रहना सफल इंसान की पहचान

रंजन ऋतुराज जैसे पाठक इसे एक सांस में पढ़ चुके हैं और इसे पिता-चाचा को भेंट करने की बात कहते हैं. खासकर उन लोगों के लिए जो दिन भर “डबल रजाई में सोए रहते हैं”. पुस्तक रिटायरमेंट को नौकरी से छुट्टी मानती है, जीवन से नहीं. यह सिखाती है कि जीवन के अंतिम क्षण तक पॉजिटिव बने रहना ही सफल इंसान की पहचान है.

समग्र रूप से, “साठ पार के सुपरस्टार” उन सभी के लिए एक जरूरी पढ़ाई है जो रिटायरमेंट या उसकी ओर बढ़ रहे हैं. यह बोझ नहीं, बल्कि अवसर के रूप में दूसरी पारी को जीने की प्रेरणा देती है. उम्र से लड़ने की नहीं, उम्र के साथ उड़ान भरने की किताब है.

पुस्तक : साठ पार के सुपरस्टार
लेखक: विजय सिंह
प्रस्तावना: शशि शेखर (प्रधान संपादक, हिन्दुस्तान)

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-भारत एक्सप्रेस



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