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शहीद दिवस 2026: कैसे शुरू हुई दो मिनट मौन की परंपरा

30 जनवरी को शहीद दिवस पर रखा जाने वाला दो मिनट का मौन सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि आज़ादी के लिए बलिदान देने वाले शहीदों को सामूहिक श्रद्धांजलि है. जानिए कैसे फील्ड मार्शल के.एम. कारियप्पा के सुझाव और पंडित नेहरू की पहल से इस राष्ट्रीय परंपरा की शुरुआत हुई.

shaheed diwas 2026
Edited by Vaibhav Gupta

30 जनवरी को भारत में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है. यह दिन महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है, इसी दिन 1948 में नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी थी. इस दिन पूरे देश में सुबह 11 बजे दो मिनट का मौन (two-minute silence) रखा जाता है, जो स्वतंत्रता संग्राम में बलिदान देने वाले सभी शहीदों को श्रद्धांजलि देने का प्रतीक है. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य गणमान्य व्यक्ति राजघाट पर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं, और देशभर में यह मौन सभी कार्यालयों, स्कूलों, रेलवे स्टेशनों आदि पर मनाया जाता है.

लेकिन इस दो मिनट के मौन की परंपरा कैसे शुरू हुई? यह एक दिलचस्प ऐतिहासिक कहानी है, जो फील्ड मार्शल के.एम. कारियप्पा और भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पत्राचार से जुड़ी है.

परंपरा की शुरुआत: कारियप्पा का सुझाव

1954 में, फील्ड मार्शल के.एम. कारियप्पा (तत्कालीन भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ) उस समय भारत के हाई कमिश्नर के रूप में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में तैनात थे. उन्होंने 14 मई 1954 को नेहरू को एक पत्र लिखा. इसमें उन्होंने सुझाव दिया कि गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर उन सभी लोगों की स्मृति में एक मिनट का मौन रखा जाए, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान दिया. उनका विचार था कि यह मौन पूरे भारत में एक साथ मनाया जाए, ताकि यह एक राष्ट्रीय श्रद्धांजलि बने.

नेहरू को यह विचार पसंद आया, लेकिन उन्होंने इसे 26 जनवरी के बजाय 30 जनवरी (गांधी जी की पुण्यतिथि) पर लागू करने का फैसला किया. नेहरू ने मुख्य मंत्रियों से परामर्श की और 1955 में इस परंपरा को औपचारिक रूप दिया गया. शुरू में यह एक मिनट का मौन था, लेकिन बाद में इसे दो मिनट में बदल दिया गया. साथ ही, भारतीय सेना की बगल (bugle) की आवाज के साथ “Last Post” बजाया जाने लगा, जो सैनिक परंपरा में शहीदों को सम्मान देने का प्रतीक है.

नेहरू और कारियप्पा के बीच पत्राचार

नेहरू ने कारियप्पा के सुझाव पर विचार-विमर्श किया. उन्होंने मुख्य मंत्रियों को पत्र लिखकर पूछा कि क्या 30 जनवरी को दो मिनट का मौन रखना उचित होगा. कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया कि गणतंत्र दिवस की खुशियों के बीच यह मौन ठीक नहीं रहेगा, इसलिए 30 जनवरी बेहतर है. नेहरू ने 1955 में इसे मंजूरी दी, और तब से यह परंपरा चली आ रही है.

1958 में नेहरू ने फिर मुख्य मंत्रियों को याद दिलाया कि 11 बजे दो मिनट का मौन रखें, और जहां संभव हो, लोग एक साथ इकट्ठा होकर इसे मनाएं. कारियप्पा ने भी बाद में इस पर अपनी राय दी कि यह मौन “सादगी, पवित्रता और शांति” के माहौल में होना चाहिए.

आज का महत्व

आज यह दो मिनट का मौन सिर्फ गांधी जी को नहीं, बल्कि सभी स्वतंत्रता सेनानियों, सैनिकों और राष्ट्र के लिए बलिदान देने वालों को याद करने का माध्यम है. यह एक ऐसा पल है जब पूरा देश एक साथ रुकता है, चुप होता है और उन बलिदानों को सलाम करता है जिनके कारण हमें आज आजादी मिली.

यह परंपरा बताती है कि कैसे एक सैन्य अधिकारी का सुझाव और एक प्रधानमंत्री की दूरदर्शिता ने मिलकर एक राष्ट्रीय रिवाज को जन्म दिया, जो आज भी जीवंत है.

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-भारत एक्सप्रेस



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