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तुर्किये से आई है होली की शान गुजिया, ठंडई का क्या है इतिहास, जानें राजपूत और मुगल कैसे मनाते थे होली?

Holi History: इतिहासकारों के मुताबिक गुजिया को भारत में 13वीं शताब्दी में तुर्की के व्यापारी भारत लेकर आए. हालांकि भारत में इसे तुर्की की जगह इसका भारतीय रूप दिया गया. तुर्की के बकलावा में फ्लेकी पेस्ट्री डाला था. जबकि भारत में इसकी जगह ड्राईफ्रूट्स, खोया, घी भरकर तला गया और इसे आधा चांद जैसी शेप दी गई.

Holi History

Holi History: रंग-गुलाल, पिचकारी, ठंडई और फाग गीतों और गुजिया से मनाई जाती है मजदेरा होली. आज 4 मार्च को पूरे देश में होली मनाई जा रही है. लोग एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर और ठंडई के रस में झूमते हुए होली मना रहे हैं. पर क्या आपको पता है कि होली की शान गुजिया भारत की है ही नहीं. यह तुर्की से भारत आई थी. वहीं ठंडई का इतिहास तो हजारों साल पुराना है.

“क्यों मो पे रंग की मारी पिचकारी, देखो कुँवर जी दूँगी मैं गारी” यह शेर भारत के अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने कही थी. जो होली के महत्व को बताता है. भारत में होली का त्योहार मनाने का जिक्र पहली बार 3500 साल पहले अथर्ववेद में हुआ है. जिसमें होलका त्योहार के बारे में बताया गया है कि यह फाल्गुन पूर्णिमा की रात में मनाया जाता है. तब की होलका आज होलिका दहन के रूप में मनाई जाती है.

अथर्ववेद में बताया गया है कि यह त्योहार राजा-महाराजा महलों में मनाते थे. इस दौरान एक बड़े उत्सव का आयोजन किया जाता था. इसके अलावा पहली सदी में लिखे गए एक काव्य संग्रह ‘गाहा सतसई’ में भी होली का जिक्र है. जिसके मुताबिक इस त्योहार को फाल्गुनी कहा जाता है. काव्य में बताया गया है कि एक राजा इस त्योहार पर अपनी महिला मित्र से फाल्गुनी त्योहार के दिन रंग फेंकने के संबंध में बात करता है.

क्या है गुजिया का इतिहास?

होली के त्योहार पर गुजिया सबसे लोकप्रिय मिठाई है. लोग इसे बड़े चाव से खाते और अपने दोस्तों-मित्रों को खिलाते हैं. पर गुजिया भारत की मिठाई नहीं है. इसकी जड़ें तुर्की तक जाती हैं. कई इतिहासकार इसे तुर्की की मिठाई बकलावा (baklava) का भारतीय रूप बताते हैं.

इतिहासकारों के मुताबिक गुजिया को भारत में 13वीं शताब्दी में तुर्की के व्यापारी भारत लेकर आए. हालांकि भारत में इसे तुर्की की जगह इसका भारतीय रूप दिया गया. तुर्की के बकलावा में फ्लेकी पेस्ट्री डाला था. जबकि भारत में इसकी जगह ड्राईफ्रूट्स, खोया, घी भरकर तला गया और इसे आधा चांद जैसी शेप दी गई. समय के साथ गुजिया उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की लोकप्रिय मिठाई बन गई.

ठंडई का होली में वैसा ही मुकाम है जैसे दिवाली में मिठाई की. बिना इसके होली सूखी ही है. ठंडई का नाम ‘ठंडा’ से आया है. यानी गर्मियों में रंग खेलने के बाद शरीर को ठंडक देने वाला पेय पदार्थ. भारत में ठंडई का इतिहास वैदिक समय से ही है.

अथर्ववेद में भांग को पांच पवित्र पौधों में से एक बताया गया है. इसे सुख का स्रोत और मुक्तिदाता बताया गया है. ठंडई बादाम, काजू, सौंफ, खसखस, इलायची, गुलाब, केसर और दूध से बनती है. इसमें भांग मिलाकर इसे फाइनल टच दिया जाता है. जिसे पीकर लोग होली में मस्ती करते हैं.

कथाओं में भी है जिक्र

ठंडई की कहानी भगवान शिव से जुड़ी हुई है. जब समुद्र मंथन में हलाहल विष पीने के बाद उनका गला जल रहा था तो उन्होंने दूध से बने एक पेय पदार्थ पिया था, जिससे उनके गले को राहत मिली थी. आयुर्वेद में भांग से बनी ठंडई को गर्मी से बचाव, इम्यूनिटी और एनर्जी बढ़ाने वाला बताया गया है. बनारस को ठंडई का हब माना जाता है.

राजपूत राजा कैसे खेलते थे होली?

भारत में होली तो हजारों सालों से मनाई जाती रही है, लेकिन इसे असली पहचान राजपूत काल में मिली. 8वीं सदी में राजस्थान के राजपूत होली को बेहद ही राजसी अंदाज में मनाते थे. होली के दिन मेवाड़ जैसे राज्य में राजा महलों और किलों में अपने प्रजा के साथ होली मनाते थे. योद्धा घोड़ों पर सवार होकर रंगों से सराबोर होते हुए एक-दूसरे पर रंग फेंकते थे और घुड़सवारी कौशल दिखाते थे.

मुगलों ने होली को बताया गुलाबों का त्योहार

होली का त्योहार मुगल काल में सिर्फ हिंदुओं का त्योहार नहीं बल्कि ईद-ए-गुलाबी (गुलाबों का त्योहार) कहा जाता था. अकबर ने इसे सुल्ह-ए-कुल (असीम शांति) का प्रतीक बताया था. वो खुद पिचकारी चुनते थे और आम लोगों के साथ महल से बाहर निकलकर होली खेलते थे. उनके महल में होली का बेहद ही राजशी आयोजन होता था.

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मुगल बादशाह जहांगीर ने तुजुक-ए-जहांगीरी में होली के बारे में बताते हुए लिखता है, होली साल का आखिरी दिन, सड़कों पर आग जलाकर पुराना साल जलाते हैं और फिर रंग-गुलाल उड़ाकर नए साल का स्वागत करते हैं. शाहजहां के समय में भी लाल किले में भव्य मेला लगता था. जहां नाच-गाने, संगीत और नौटंकी होती थी. होली पर अमीर खुसरो, रसखान जैसे कवियों ने शेर लिखकर इसे सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बताया है.

-भारत एक्सप्रेस



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