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‘ये जो जलता हुआ इश्क़ है…’ इंदौर कवि सम्मेलन में CMD उपेंद्र राय ने पहली बार पढ़ी शायरी, तालियों से गूंज उठा पूरा सभागार

इंदौर के रवीन्द्र नाट्यगृह में आयोजित कवि सम्मेलन में CMD उपेंद्र राय (CMD Upendrra Rai) ने पहली बार मंच से अपनी शायरी प्रस्तुत की. उनकी नज़्म और ग़ज़ल पर सभागार तालियों से गूंज उठा.

CMD SIR Upendrra Rai
Edited by Radha Priya

मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी इंदौर एक बार फिर कविताओं और शायरी की महक से सराबोर हो गई. मंगलवार, 24 फरवरी की रात शहर के मशहूर रवीन्द्र नाट्यगृह में ‘प्रजातंत्र मीडिया फाउंडेशन’ की ओर से आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन और मुशायरा का शानदार आयोजन हुआ.

भारत एक्सप्रेस की भागीदारी

इस बड़े साहित्यिक कार्यक्रम में ‘भारत एक्सप्रेस’ न्यूज नेटवर्क बतौर न्यूज पार्टनर जुड़ा रहा. मंच पर भारत एक्सप्रेस के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ उपेंद्र राय (CMD Upendrra Rai) की मौजूदगी ने कार्यक्रम की गरिमा और भी बढ़ा दी.

साहित्य और संस्कृति को सम्मान

CMD उपेंद्र राय (CMD Upendrra Rai) की उपस्थिति ने यह संदेश दिया कि आज भी मुख्यधारा का मीडिया साहित्य और संस्कृति को पूरा महत्व देता है. उनकी मौजूदगी ने न केवल आयोजन को खास बनाया बल्कि यह भी दिखाया कि पत्रकारिता और साहित्य का रिश्ता कितना गहरा है.

CMD ने क्या कहा?

CMD उपेंद्र राय (CMD Upendrra Rai) ने मंच पर अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी की पंक्ति ‘कवित विवेक एक नहीं मोरे, सत्य कहूं लिख कागज कोरे’ उनके जीवन का मार्गदर्शन करती रही है. उन्होंने बताया कि पत्रकारिता का सफर उन्होंने 1997 में शुरू किया था, जब वे ग्रेजुएशन के पहले वर्ष में थे.

उन्होंने (CMD Upendrra Rai) कहा कि अपने करियर का सबसे अहम समय उन्होंने सहारा न्यूज़ नेटवर्क को दिया, जहां वे ग्रुप सीईओ और एडिटर-इन-चीफ रहे. उससे पहले वे एक साधारण रिपोर्टर के रूप में काम करते थे और बाद में स्टार और सीएनबीसी जैसे बड़े नेटवर्क से जुड़े. भारत एक्सप्रेस के तीन साल के सफर को उन्होंने खास बताया और कहा कि यह चैनल एक खांटी पत्रकार द्वारा शुरू किया गया और सबके सहयोग से आगे बढ़ा.

लेखन और कविताओं का सफर

CMD ने बताया कि वे बचपन से कविताएं और शेर लिखते रहे हैं लेकिन उन्हें कभी संजोकर नहीं रखा. मोबाइल बदलने की आदत के कारण उनकी हजारों रचनाएं खो गईं. उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि उनके पास न कोई फोटो है, न कोई मेमोरी, बस फोनबुक ही बचती है.

मित्र हेमंत भाई ने उन्हें प्रेरित किया कि जो गद्य उन्होंने किताबों में दिया है, उसी तरह अपनी छुपी हुई कविताएं और शायरी भी मंच पर साझा करें. इसी दौरान उन्होंने अपनी पुरानी गज़ल और कुछ शेर सुनाए.

CMD ने यह भी कहा कि पत्रकारिता और चैनल चलाने की जिम्मेदारी कई सफेद हाथियों को पालने जैसी है. इसी भाव से उन्होंने बशीर बद्र साहब का शेर पढ़ा-

सुबह तक शाम की नज़रों से गिर जाता हूं,
इतने वादों में जीता हूं कि मर जाता हूं.

1995 में प्रकाशित पहली गज़ल

वहीं उन्होंने (CMD Upendrra Rai) आगे कहा कि मेरी पहली गज़ल जिसे जीवन में 1995 में हरीश जी ने प्रकाशित किया था, उस समय मैं अपने गांव से दसवीं पास करने के बाद लखनऊ आया था. तो मैंने लिखा कि

क्या खोया, क्या पाया मैं बताऊं कैसे आपको?
वक्त ने कितना सताया मैं कहूं कैसे आपको?

प्यार की दहलीज पर पहला कदम रखा ही था,
उसने मुझे ऐसा गिराया मैं बताऊं कैसे आपको?

नाम जिनका होना चाहिए था पन्नों के बीच,
हाशिए पर उनको पाया, मैं बताऊं कैसे आपको?

सोचा था शिकायत जाकर करूंगा उनके पास,
पर दोनों को साथ पाया, मैं बताऊं कैसे आपको?

पिता-पुत्र पर एक मजबूत शेर

इसी कड़ी में CMD उपेंद्र राय ने बताया कि वो दुबई में अपने दोस्त जमील सैदी साहब के साथ बैठे थे तो बातचीत के दौरान उन्होंने सुझाव दिया कि पिता-पुत्र पर एक मजबूत शेर लिखा जाए. उसी क्षण मैंने अपने पिता और अपने बेटे के बारे में सोचते हुए एक शेर लिखा कि

दिल मोम सा, जुबां पत्थर सी, पुरज़ोर आदमी था,
मरने के बाद बेटा कहें, बाप मेरा शेर आदमी था.

जीवन और जुझारूपन

उन्होंने कहा कि उन्होंने हमेशा उसी तेवर से ज़िंदगी जी है. उनकी इच्छा है कि जब वे इस दुनिया से जाएं तो उनका बेटा यह कहे कि मेरा पिता जुझारू था, कायर नहीं.

फिल्म से प्रेरित नज़्म

उन्होंने आगे कहा कि जब हाल ही में वो एक फिल्म देखी तो लिखने की प्रेरणा मिली. कलम उठाई तो सामने कोई खास कागज नहीं था. इंडिगो की एक फ्लाइट में एक लड़की ने उनके बारे में कुछ लिखा था, वही कागज सबसे पहले हाथ आया और उस पर उन्होंने दो मुख्ते लिखे. इसके बाद एक डायरी मिली जो उन्होंने एमिरेट्स की यात्रा के दौरान ली थी, उसी पर आगे लिखा.

उन्होंने बताया कि जिस फिल्म को उन्होंने देखा, उसे जिसने भी देखा होगा, वह उनकी नज़्म से जुड़ाव महसूस करेगा. CMD ने विनम्रता से कहा कि अगर यह रचना पसंद न आए तो क्षमा करें लेकिन उन्होंने पूरी कोशिश की है कि उस फिल्म की भावनाओं को अपनी नज़्म में उतार सकें.

ये जो जलता हुआ इश्क़ है, इसे समझा नहीं सकता,
कोई पूछे कि तूने क्या किया, मैं बता नहीं सकता.

मैं जो तेरे साथ रहते-रहते जी गया, वो वक्त मेरा था,
हमारे बीच क्या बातें हुईं, मैं किसी को बता नहीं सकता.

लबों के मीनार पर जो तुम कहते-कहते रुक गई थी,
वो क्या था जो तुम्हें रोक गया, मैं समझा नहीं सकता.

तुमसे जो बिन मिले अकेले में बातें हो गईं,
वो खुदा को भी मैं बता नहीं सकता.

जान की बाज़ी रोज़ लगाता हूं तेरे लिए,
ये हौसला रखता हूं, मगर किसी को बता नहीं सकता.

महफ़िल में मिलकर भी हम पराए से लगते हैं,
गले लगाऊं तो भी तुझे गले लगा नहीं सकता.

कभी सोचा ही नहीं कि तुम इतने करीब तक आओगी,
और मैं बताऊं कि गले लगने के बाद कितनी दूरी है, समझा नहीं सकता.

मर तो सकता हूं तेरे खातिर,
पर कई बार तेरे लिए मर चुका हूं, ये दुनिया को बता नहीं सकता.

कभी कोई और ज़िंदगी होगी तो उससे पूछूंगा,
जान देने वाला क्या तेरे इतने करीब तक आ नहीं सकता.

शजर जो पुकारे तो परिंदे दूर से भी आ जाते हैं,
मैं तेरे करीब रहकर पुकारता रहा, तुमने सुना ही नहीं.

जो बदल गया रद्दो-बदल में, मैं सोचता हूं नहीं बदला,
पर इतना बदला कि झूठ बोलने लगा.

दोस्ती पर शेर लिखने का किस्सा

एडिटर-इन-चीफ (CMD Upendrra Rai) ने आगे कहा कि एक बहुत करीबी दोस्त गांव से मिलने आया. शहरों में रहते हुए काम करने के तरीके और जीवनशैली बदल जाती है लेकिन बचपन की यादें कभी नहीं बदलतीं. बचपन में जिन लोगों को पहचानते हैं उनकी पहचान हमेशा कायम रहती है.

उस दोस्त ने पूछा कि और बताओ, कैसे हो? क्या कर रहे हो? मैंने कहा कि कारोबार और व्यापार की बातें बताऊंगा तो शायद तुम समझ नहीं पाओगे. लेकिन बचपन के साथी होने के नाते, जिनके साथ नदी में नहाए, खेले और बड़े हुए, उनके लिए मैंने एक शेर लिखा. मैंने कहा कि तुम्हें समर्पित करके एक शेर लिखता हूं. साथ ही अपने छोटे भाई को भी समर्पित किया, क्योंकि वह अक्सर मेरे साथ यात्रा करता है.

तुम जो हो, तुम्हारे आने पर मैं बचा ही नहीं,
ऐसा क्या है जो तुमको पता ही नहीं?

जीवन का सबसे भारी शेर

CMD उपेंद्र राय ने कहा कि 24 दिसंबर को जब मैं दुबई से लंदन जा रहा था तो सफर के दौरान मन में कई विचार आए. सोच रहा था कि जीवन में क्या पाया, क्या खोया और क्या हिसाब-किताब रहा? उसी दौरान एक शेर लिखा, जो मुझे अब तक का सबसे भारी शेर लगता है.

वहीं उन्होंने आगे कहा कि जैसे घर-परिवार में लोग सोचते हैं कि क्या बचा लें, क्या एफडी कर लें, कहां जोड़ें या कहां घटाएं, वैसे ही विचार मेरे मन में चल रहे थे. भारत एक्सप्रेस जैसी बड़ी कंपनी खड़ी हो गई, देशभर में 3640 पत्रकार जुड़ गए, 50 शहरों में ब्यूरो स्थापित हो गए, सब कुछ हासिल हो गया. लेकिन फिर भी मन में सवाल उठता रहा कि मैंने क्या खोया और क्या पाया? उसी सोच पर मैंने यह शेर लिखा कि

क्या तकसीम करूं? कुछ बचा ही नहीं,
ये बहुत बाद में समझ में आया कुछ था ही नहीं.

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-भारत एक्सप्रेस



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