हरिश जैन
पुलिस की बस से उतरने से पहले हिरासत में ली गई एक युवती ने वहां मौजूद महिला कांस्टेबल से कहा कि वह अपनी वर्दी पर उसका नाम का बैज लगाए. कांस्टेबल ने अपनी जेब से बैज निकाला और युवती की छाती पर लगा दिया. यह छोटा-सा वाकया देखने में भले ही मामूली लगे, लेकिन इसके पीछे एक बड़ी बात छिपी थी. युवती खुद पुलिस की हिरासत में थी, फिर भी वह चाहती थी कि उसके साथ कार्रवाई करने वाला व्यक्ति अपनी पहचान सामने रखे. यानी अगर आम नागरिक को जवाब देना पड़ता है, तो सत्ता में बैठे लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी से बचना नहीं चाहिए.
सड़कों पर होने वाले आंदोलनों को समझने के लिए यह घटना काफी कुछ कहती है. जब किसी प्रदर्शन में एक आवाज उठती है, ‘इंकलाब’, और भीड़ एक साथ जवाब देती है, ‘जिंदाबाद’, तो वहां सिर्फ एक नारा नहीं लगाया जा रहा होता. अलग-अलग जगहों से आए, अलग-अलग परेशानियों से जूझ रहे लोग अचानक खुद को एक साझा लड़ाई का हिस्सा महसूस करने लगते हैं.
आज भारत में कहीं रोजगार और भर्ती परीक्षाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं, कहीं किसानों की मांगें हैं, तो कहीं चुनावी प्रक्रिया, नागरिक अधिकारों और भेदभाव को लेकर विरोध हो रहा है. मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन इन आंदोलनों में एक बात अक्सर समान दिखाई देती है. लोग चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए और जिन संस्थाओं के पास फैसले लेने की ताकत है, वे अपने फैसलों के लिए जवाबदेह बनें.
ऐसे में सवाल उठता है कि आज भी ‘इंकलाब जिंदाबाद’ जैसा पुराना नारा लोगों को इतना आकर्षित क्यों करता है? क्या हर बार इस नारे का मतलब व्यवस्था को पूरी तरह बदल देना होता है? या फिर इसके पीछे कोई ऐसी भावना है, जो समय के साथ नए अर्थ लेती रही है?
भगत सिंह ने इंकलाब का मतलब क्या बताया था?
‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा भगत सिंह ने नहीं बनाया था. भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने भी माना था कि वे इस नारे के मूल रचनाकार नहीं हैं. लेकिन उनके संघर्ष, मुकदमों और विचारों ने इसे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में एक खास पहचान दिलाई.
दिसंबर 1928 में सॉन्डर्स की हत्या के बाद जारी क्रांतिकारी पर्चे में इस नारे का इस्तेमाल हुआ. इसके बाद 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने के बाद पर्चे बांटे और गिरफ्तारी दी. इस घटना ने पूरे देश का ध्यान खींचा. लेकिन उनके विचारों में सबसे अहम सवाल यह था कि आखिर क्रांति का मतलब क्या है?
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 6 जून 1929 को अदालत में अपना पक्ष रखते हुए साफ किया कि क्रांति का अर्थ सिर्फ बम और पिस्तौल चलाना नहीं है. उनके लिए क्रांति का मकसद ऐसा समाज बनाना था, जहां अन्याय और शोषण के लिए जगह न हो.
उन्होंने उस व्यवस्था पर सवाल उठाया जिसमें किसान दूसरों के लिए अनाज पैदा करता है, लेकिन उसका अपना परिवार भूखा रह जाता है. कपड़ा बुनने वाला व्यक्ति खुद पर्याप्त कपड़ों के बिना रहता है और आलीशान इमारतें बनाने वाला मजदूर गरीबी में जिंदगी गुजारता है.
यानी भगत सिंह की नजर में असली समस्या केवल अंग्रेजी हुकूमत नहीं थी. वे यह भी पूछ रहे थे कि समाज की दौलत पैदा कौन करता है, उसका फायदा किसे मिलता है और मेहनत करने वाले लोगों को उनके बुनियादी अधिकार क्यों नहीं मिलते.
उनके विचारों में समाजवाद की झलक साफ दिखाई देती थी. वे ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें मेहनतकश लोगों को सम्मान और उनके श्रम का उचित हिस्सा मिले.
इसलिए भगत सिंह को याद करते समय सिर्फ उनके साहस, पिस्तौल या फांसी की बात करना पर्याप्त नहीं है. उनके विचारों को समझना भी जरूरी है. उनके लिए क्रांति का असली उद्देश्य लोगों की जिंदगी में बेहतर बदलाव लाना था.
बदलाव की चाह ही क्रांति की असली ताकत
दिसंबर 1929 में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ‘मॉडर्न रिव्यू’ के संपादक रमानंद चटर्जी की आलोचना का जवाब देते हुए क्रांति के अर्थ को फिर स्पष्ट किया.
उनका कहना था कि क्रांति का मतलब हर समय संघर्ष या हिंसा करते रहना नहीं है. समस्या तब पैदा होती है, जब लोग किसी व्यवस्था के इतने आदी हो जाते हैं कि उसमें बदलाव की संभावना से भी डरने लगते हैं. धीरे-धीरे गलत चीजें भी सामान्य लगने लगती हैं और अन्याय को जिंदगी का हिस्सा मान लिया जाता है.
भगत सिंह ने क्रांतिकारी भावना को बेहतर बदलाव की इच्छा से जोड़ा था. उनका विचार था कि कोई व्यवस्था आज अच्छी दिखाई दे रही हो, तब भी उसे समय के साथ सुधारने की जरूरत हो सकती है. अगर समाज बदलाव की गुंजाइश ही खत्म कर दे, तो विकास का रास्ता भी बंद हो जाता है.
आज के आंदोलनों में इस विचार को समझना खास तौर पर जरूरी है. जब कोई छात्र भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ आवाज उठाता है या कोई नागरिक अपने अधिकारों की मांग करता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह हथियार उठाकर सत्ता बदलना चाहता है.
कई बार उसका सीधा-सा सवाल होता है जो व्यवस्था मेरे भविष्य और अधिकारों से जुड़े फैसले ले रही है, क्या वह अपना काम ठीक से कर रही है?
यही सवाल ‘इंकलाब जिंदाबाद’ को आज भी प्रासंगिक बनाता है. इस नारे का अर्थ केवल पुरानी क्रांतिकारी घटनाओं को याद करना नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों पर सवाल उठाना भी है जिनमें लोगों को बदलाव की जरूरत महसूस होती है.
एक नारा कैसे बन जाता है हजारों लोगों की आवाज?
भगत सिंह और उनके साथियों के मुकदमों ने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ को अदालतों से बाहर निकालकर आम लोगों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई. लाहौर में मुकदमे के दौरान क्रांतिकारी नारे और देशभक्ति के गीत उनके विरोध का हिस्सा बन गए थे.
अदालत के पास उन्हें सजा देने की ताकत थी, लेकिन वे अपने विचारों का अर्थ तय करने का अधिकार पूरी तरह सत्ता के हाथ में छोड़ने को तैयार नहीं थे. मई 1930 में ट्रिब्यूनल की कार्यवाही के दौरान आरोपियों के साथ हुई मारपीट ने इस टकराव को और उजागर किया.
क्रांतिकारी सुखदेव ने जेल से लिखे एक पत्र में इस बात का जिक्र किया था कि एक छोटी-सी आवाज अब बहुत बड़ी हो चुकी है और बच्चे तक ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाने लगे हैं. इससे पता चलता है कि यह नारा अपने शुरुआती दायरे से कितना आगे निकल चुका था.
समय बदला, पीढ़ियां बदलीं और आंदोलनों के मुद्दे भी बदलते गए, लेकिन यह नारा अलग-अलग संघर्षों में सुनाई देता रहा. आज मजदूर अपने बकाया वेतन के लिए, किसान अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए और छात्र परीक्षा में निष्पक्षता की मांग को लेकर इसे लगा सकते हैं. उनकी समस्याएं एक जैसी नहीं हैं, लेकिन अन्याय के सामने चुप न रहने की भावना उन्हें जोड़ सकती है.
भीड़ में नारे लगाने का असर केवल सुनाई देने तक सीमित नहीं रहता. जो व्यक्ति अकेले अपनी बात कहने से डरता है, उसे दूसरों के साथ खड़े होकर बोलने का हौसला मिल सकता है. उसे महसूस होता है कि उसकी परेशानी सिर्फ उसकी अपनी नहीं है.
बेशक, केवल नारा लगाने से किसी समस्या का समाधान नहीं निकलता. लेकिन यह लोगों को एकजुट करने और लंबे संघर्ष के दौरान उनका हौसला बनाए रखने में मदद कर सकता है. इसके बाद जरूरी होता है कि लोग अपनी मांगों को स्पष्ट करें, एक-दूसरे की बात सुनें और बदलाव के लिए लगातार प्रयास करें.
साल 2020-21 के किसान आंदोलन और 2024 में शंभू सीमा पर शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर दिखाया कि जब लोगों को लगता है कि उनकी आजीविका से जुड़े फैसलों में उनकी बात को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा, तो वे सामूहिक रूप से आवाज उठाते हैं.
किसानों की मांगें खेती और रोजी-रोटी से जुड़ी थीं. वहीं, भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं को लेकर प्रदर्शन करने वाले युवाओं की चिंता उनके भविष्य से जुड़ी है.
एक छात्र कई साल तक परीक्षा की तैयारी करता है. परिवार अपनी बचत का बड़ा हिस्सा उसकी पढ़ाई पर खर्च कर देता है. ऐसे में अगर पेपर लीक हो जाए, परीक्षा रद्द हो जाए या भर्ती प्रक्रिया लंबे समय तक अटकी रहे, तो नुकसान सिर्फ समय का नहीं होता. परिवार की उम्मीदें और युवा का आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है.
ऐसी स्थिति में अभ्यर्थी का सवाल केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता. वह जानना चाहता है कि अगर मेहनत करने के बाद भी प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं होगी, तो उसे न्याय कैसे मिलेगा?
यही वजह है कि परीक्षा में पारदर्शिता और समय पर भर्ती की मांग को युवाओं के अधिकारों से जोड़कर देखा जाता है. वे चाहते हैं कि सरकारी संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी निभाएं और किसी की मेहनत व्यवस्था की खामियों के कारण बेकार न जाए.
चुनावी प्रक्रिया पर सवाल और जवाबदेही की मांग
मतदाता सूचियों में बदलाव को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों ने इस बहस को एक और महत्वपूर्ण दिशा दी है. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि मतदाता सूची में संशोधन के दौरान पात्र नागरिकों के नाम हटाए जा रहे हैं और इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है. दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य दोहराए गए और अपात्र नामों को हटाना है.
इन दोनों पक्षों के दावों के बीच जरूरी है कि तथ्यों की जांच हो और प्रक्रिया के बारे में लोगों को स्पष्ट जानकारी मिले. क्योंकि मतदाता सूची केवल सरकारी दस्तावेज नहीं है. यह उस व्यवस्था का अहम हिस्सा है जिसके जरिए नागरिक अपने प्रतिनिधि चुनते हैं.
जब किसी व्यक्ति को अपने मताधिकार को लेकर चिंता होती है, तो मामला सिर्फ एक नाम के सूची में होने या न होने का नहीं रह जाता. सवाल यह भी होता है कि क्या लोकतंत्र में उसकी भागीदारी सुरक्षित है और क्या संबंधित संस्थाएं उसकी शिकायत सुनेंगी?
इसी तरह परीक्षा, रोजगार और चुनाव से जुड़े मुद्दे अलग होने के बावजूद एक साझा सवाल सामने लाते हैं. क्या आम नागरिक उन संस्थाओं से जवाब मांग सकता है जो उसके जीवन को प्रभावित करने वाले फैसले लेती हैं?
विरोध प्रदर्शनों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
आज के आंदोलनों की एक और महत्वपूर्ण बात महिलाओं की बढ़ती भागीदारी है. महिलाएं अब केवल प्रदर्शन में शामिल होने तक सीमित नहीं हैं. वे पत्रकारिता, सोशल मीडिया, यूट्यूब और दूसरे सार्वजनिक मंचों के जरिए भी आंदोलनों की आवाज को आगे बढ़ा रही हैं.
अपनी बात रखने के लिए वे रिपोर्टिंग, तस्वीरों, वीडियो, व्यंग्य और दूसरे रचनात्मक तरीकों का इस्तेमाल करती हैं. इससे आंदोलन की बातें उन लोगों तक भी पहुंच सकती हैं, जो घटनास्थल पर मौजूद नहीं हैं.
लेकिन महिलाओं की भागीदारी अपने साथ कुछ जरूरी सवाल भी लेकर आती है. क्या उन्हें सार्वजनिक जगहों पर बिना डर अपनी बात रखने का अधिकार मिल रहा है? क्या किसी प्रदर्शन को कवर करने वाली महिला पत्रकार सुरक्षित है? और क्या विरोध जताने के दौरान महिलाओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाता है?
इंडियन एक्सप्रेस की 5 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, तीन महिला पत्रकारों ने आरोप लगाया था कि प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान पुलिस ने उनका यौन उत्पीड़न किया. रिपोर्ट में बताया गया कि पुलिस ने इन शिकायतों की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी थी. इन आरोपों की जांच जरूरी है और अंतिम निष्कर्ष तथ्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए.
इस मामले ने एक बड़ी चिंता को सामने रखा है. लोकतंत्र में नागरिकों को अपनी बात कहने का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब वे बिना उत्पीड़न या अपमान के सार्वजनिक जीवन में हिस्सा ले सकें.
इसी तरह, 12 अक्टूबर को रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों को कवर कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लेने और उनके साथ कथित तौर पर सख्ती किए जाने का जिक्र किया गया था. पुलिस ने पहले कहा था कि कुछ प्रदर्शनकारी पत्रकार बनकर आए थे. ऐसे मामलों में दोनों पक्षों के दावों की जांच और घटनाओं का विश्वसनीय रिकॉर्ड बेहद महत्वपूर्ण है.
पत्रकारों का काम केवल घटना की जानकारी देना नहीं, बल्कि जनता के सामने तथ्य रखना भी है. इसलिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि किसी घटना की रिपोर्टिंग करने वालों को अपना काम करने का मौका मिले और उनके साथ हुए किसी भी कथित दुर्व्यवहार की निष्पक्ष जांच हो.
तिरंगा और संविधान लेकर सड़क पर उतरने का मतलब
कई आंदोलनों में लोग तिरंगा लेकर चलते हैं और संविधान की प्रतियां हाथ में रखते हैं. पहली नजर में यह अजीब लग सकता है कि क्रांति का नारा लगाने वाले लोग देश के झंडे और संविधान के साथ क्यों खड़े होते हैं. लेकिन उनके लिए इन प्रतीकों का एक खास अर्थ है.
तिरंगा उस देश की पहचान है, जिसके वे नागरिक हैं. संविधान उन्हें मिले अधिकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद को सामने रखता है. इनके साथ खड़े होकर प्रदर्शनकारी यह संदेश देना चाहते हैं कि वे देश से अलग नहीं हैं, बल्कि देश के लोकतांत्रिक वादों को पूरा करने की मांग कर रहे हैं.
यहां भगत सिंह, महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचार अलग-अलग रूपों में सामने आते हैं. भगत सिंह का संघर्ष अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस देता है. गांधी का तरीका अहिंसक और संगठित जनभागीदारी की अहमियत समझाता है. वहीं, आंबेडकर के विचार समानता, सम्मान और सामाजिक न्याय की जरूरत को रेखांकित करते हैं.
इन तीनों की विचारधाराएं और राजनीतिक रास्ते एक जैसे नहीं थे. इसलिए उन्हें एक ही विचार में समेटना सही नहीं होगा. लेकिन आज के आंदोलनों में लोग इनसे अलग-अलग तरह की प्रेरणा ले सकते हैं—अन्याय का विरोध करने का हौसला, शांतिपूर्ण ढंग से एकजुट होने का तरीका और समान अधिकारों की मांग करने की समझ.
शांतिपूर्ण विरोध का अर्थ यह नहीं कि अन्याय को चुपचाप स्वीकार कर लिया जाए. उसी तरह, अन्याय का विरोध करने का मतलब हिंसा करना भी नहीं है. लोग दृढ़ता के साथ अपनी मांग रख सकते हैं और साथ ही दूसरों के अधिकारों का सम्मान भी कर सकते हैं.
नारे के बाद क्या?
किसी भी आंदोलन की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसमें कितनी भीड़ जुटी या कितनी जोर से नारे लगाए गए. इसके लिए संगठन, स्पष्ट मांगें और लंबे समय तक संघर्ष करने की तैयारी भी जरूरी होती है.
आंदोलन को अपनी बात उन लोगों तक पहुंचानी पड़ती है, जो उससे सीधे जुड़े नहीं हैं. उसे अपने भीतर मौजूद अलग-अलग आवाजों को भी सुनना होता है, ताकि किसी एक समूह की परेशानी दूसरे की आवाज को दबा न दे.
यहां एक बात समझना भी जरूरी है कि आज का भारत ब्रिटिश शासन के दौर वाला भारत नहीं है. देश में चुनाव होते हैं, प्रतिनिधि संस्थाएं काम करती हैं और संविधान नागरिकों को अधिकार देता है. इसलिए आज के आंदोलनों की परिस्थितियां और संभावनाएं स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से अलग हैं.
लेकिन लोकतंत्र होने का अर्थ यह नहीं कि संस्थाओं से सवाल नहीं पूछे जा सकते. दरअसल, लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि नागरिक अपनी शिकायतें सामने रख सकें और संस्थाएं उनका जवाब दें. संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मौजूदगी लोगों को न्याय मांगने का रास्ता देती है, साथ ही यह कसौटी भी तय करती है कि सत्ता का इस्तेमाल किस तरह होना चाहिए.
आज सड़क पर उतरने वाला छात्र निष्पक्ष परीक्षा चाहता है, मतदाता अपने अधिकार की सुरक्षा चाहता है, महिला समान व्यवहार की मांग करती है और पत्रकार घटनाओं को बिना डर दर्ज करना चाहता है. इन सभी की समस्याएं अलग हैं, लेकिन उनकी मांगों के पीछे सम्मान, अवसर और जवाबदेही की जरूरत दिखाई देती है.
यही वह जगह है, जहां एक पुराना नारा नई पीढ़ी के लिए नया अर्थ हासिल करता है.
‘इंकलाब जिंदाबाद’ का महत्व इस बात में नहीं है कि इसे कितनी बार दोहराया गया. इसकी असली ताकत इस सवाल में है कि इसे लगाने वाले लोग किस तरह का बदलाव चाहते हैं और उस बदलाव के लिए क्या करने को तैयार हैं.
तिरंगा उन्हें देश से जोड़ता है, संविधान उनके अधिकारों और जिम्मेदारियों की याद दिलाता है और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ उनके भीतर बदलाव की उम्मीद को आवाज देता है.
आखिरकार, सड़क पर हो क्या रहा है? आम लोग उन फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं, जिनका असर उनकी जिंदगी पर पड़ता है. वे यह भी जानना चाहते हैं कि फैसले लेने वाली संस्थाएं उनकी बात सुनने और अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए कितनी तैयार हैं.
एक नारा अपने आप व्यवस्था नहीं बदल सकता. लेकिन वह लोगों को अपनी ताकत पहचानने, एक-दूसरे की परेशानियों को समझने और बदलाव की मांग को मिलकर आगे बढ़ाने का रास्ता जरूर दिखा सकता है.
ये भी पढ़ें: ‘मैं आज भी नीतीश के साथ…’, अनंत सिंह ने 9 मौतों वाले बयान पर दी सफाई, नीरज कुमार पर भी साधा निशाना
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.





