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‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार…’, जस्टिस बी.आर. गवई ने बॉम्बे हाईकोर्ट में दिया संबोधन

जस्टिस केटी देसाई मेमोरियल लेक्चर के दौरान जस्टिस बी.आर. गवई ने कहा- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आधार है. संविधान ने इसे मजबूत सुरक्षा दी, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था के लिए सीमाएं भी तय कीं.

Justice K.T. Desai Memorial Lecture
Vijay Ram Edited by Vijay Ram

Justice B.R. Gavai Speech: 5 दिसंबर 2025 को बॉम्बे हाईकोर्ट में जस्टिस केटी देसाई मेमोरियल लेक्चर हुआ. पूर्व चीफ जस्टिस बी.आर. गवई ने भी उसमें संबोधन दिया. विषय था – “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: संविधान में इसका दायरा और सीमाएं”. जस्टिस गवई ने सरल शब्दों में बताया कि यह अधिकार लोकतंत्र का आधार है.

जस्टिस गवई ने कहा कि 75 सालों में सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजबूत किया. स्‍टेट की रोक सीमित रखी. यह अधिकार नागरिकों को सोचने, बोलने और लोकतंत्र में भाग लेने की ताकत देता है.

जस्टिस केटी देसाई को दी गई श्रद्धांजलि

जस्टिस गवई ने सबसे पहले जस्टिस कांतिलाल ठाकोरदास देसाई को याद किया. वे पोस्ट-इंडिपेंडेंस काल के प्रमुख जज थे. 1903 में जन्मे देसाई बॉम्बे हाईकोर्ट में वाणिज्यिक मामलों के विशेषज्ञ थे. 1957 में जज बने, फिर गुजरात हाईकोर्ट के पहले चीफ जस्टिस. रिटायरमेंट के बाद बैंक ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष रहे. उनका ‘देसाई बैंक अवार्ड’ आज भी प्रसिद्ध है. यह लेक्चर उनकी याद में हर साल होता है.

जस्टिस सुजाता मनोहर को सम्मान

जस्टिस गवई ने जस्टिस सुजाता मनोहर को भी श्रद्धांजलि दी. वे जस्टिस देसाई की बेटी हैं और भारत की प्रमुख महिला जज रहीं. बॉम्बे हाईकोर्ट की पहली महिला जज, फिर केरल और बॉम्बे की चीफ जस्टिस. सुप्रीम कोर्ट में विशाखा गाइडलाइंस केस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जस्टिस गवई ने कहा कि वे महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं.

संविधान सभा की बहस

जस्टिस गवई ने बताया कि अनुच्छेद 19(1)(ए) नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है. लेकिन 19(2) में सीमाएं हैं – जैसे मानहानि, अदालत की अवमानना, सार्वजनिक व्यवस्था. डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि भारत ने सीमाएं स्पष्ट लिखीं, जबकि अमेरिका में कोर्ट ने बाद में तय कीं.

शुरुआती केस और पहला संशोधन

संविधान लागू होने के बाद रोमेश थापर केस में सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास सरकार का बैन हटाया. इससे पहला संशोधन हुआ, जिसमें सार्वजनिक व्यवस्था, विदेशी संबंध जैसे आधार जोड़े गए.

सार्वजनिक व्यवस्था बनाम अभिव्यक्ति

जस्टिस गवई ने तीन महत्वपूर्ण केस बताए – रामजी लाल मोदी (1957), राम मनोहर लोहिया (1960) और केदार नाथ सिंह (1962). इनमें कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति पर रोक तभी जब हिंसा का सीधा खतरा हो. राजद्रोह कानून को सीमित किया गया.

प्रेस की स्वतंत्रता

बेनेट कोलमैन केस (1972) में न्यूजप्रिंट पॉलिसी रद्द हुई. कोर्ट ने कहा कि प्रेस को विचार फैलाने का पूरा अधिकार है. कोई पूर्व रोक नहीं लग सकती.

लोगों को जानने का अधिकार

राज नारायण केस (1975) में कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति में जानने का अधिकार शामिल है. मनeka गांधी केस (1978) में अनुच्छेद 14, 19 और 21 को ‘गोल्डन ट्राएंगल’ बताया.

मीडिया और तकनीक का दौर

1980-90 में टीवी, फिल्मों पर केस आए. क्रिकेट एसोसिएशन केस (1995) में एयरवेव्स पर सरकारी एकाधिकार खत्म हुआ. पीयूसीएल केस (1997) में फोन टैपिंग पर सख्त नियम बने.

डिजिटल युग की चुनौतियां

श्रेया सिंघल केस (2015) में आईटी एक्ट की धारा 66A रद्द हुई. पुट्टस्वामी केस (2017) में प्राइवेसी को मूल अधिकार माना. अनुराधा भसीन केस (2020) में इंटरनेट शटडाउन पर रोक लगाई. हाल के केस जैसे अर्नब गोस्वामी, विनोद दुआ में पत्रकारों की अभिव्यक्ति की रक्षा हुई.

कोर्ट ने अभिव्यक्ति को ट्रांसजेंडर अधिकार, पार्टनर चुनने की स्वतंत्रता तक बढ़ाया. लेकिन दिव्यांगों का मजाक उड़ाने पर चेतावनी दी. इलेक्टोरल बॉन्ड्स केस में पारदर्शिता को प्राथमिकता दी. जस्टिस गवई के संबोधन के अंत में सभी ने तालियां बजाईं.

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