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सुप्रीम कोर्ट में आजीवन चुनाव प्रतिबंध याचिका पर केंद्र सरकार ने किया विरोध, पढ़ें पूरा मामला

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर सजायाफ्ता नेताओं पर आजीवन चुनाव लड़ने के प्रतिबंध का विरोध किया. कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 और 9 की समीक्षा की आवश्यकता जताई.

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट.

आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट ने हलफनामा दाखिल कर याचिका का विरोध किया है. केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि सजायाफ्ता लोगों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता. केंद्र सरकार ने कहा है कि संसद ने स्थितियों को ध्यान में रखकर व्यवस्था तय की है. सदन से किसी को अयोग्य करार देने की स्थितयां भी स्पष्ट है.

हलफनामा में यह भी कहा गया है कि याचिकाकर्ता द्वारा दाखिल याचिका में विभिन्न पहलुओं को अस्पष्ट तौर पर पेश किया गया है. साथ केंद्र सरकार ने इसको लेकर दाखिल याचिका को खारिज करने की मांग की है. पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दे दिया था. यह याचिका अश्विनी कुमार उपाध्याय ने 2016 में दायर की थी.

कोर्ट की पिछली सुनवाई में टिप्पणी

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि एक सरकारी कर्मचारी रेप या हत्या के मामले में दोषी करार दिया जाता है तो उसकी नौकरी चली जाती है और उसे वापस नही मिलती है, लेकिन एमपी/एमएलए को दोषी करार दिया जाता है तो चुनाव लड़ने पर 6 साल के लिए प्रतिबंध लगाया जाता है. उसके बाद दोबारा चुनाव लड़ कर सांसद या विधायक बन सकता है, मंत्री बन सकता है. इसलिए जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 और 9 को जांच करना पड़ेगा.

RPA की धारा 8 पर सवाल

पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने सलाह दिया था कि सजायाफ्ता नेताओं को जीवन भर चुनाव नहीं लड़ने देना चाहिए. याचिका में कहा गया है कि आरपीए की धारा 8 के तहत 2 साल या उससे अधिक की सजा पाने वाले नेता को गलत रियायत दी गई है. ऐसा सजायाफ्ता नेता अपनी सजा पूरी करने के 6 साल बाद चुनाव लड़ने के योग्य हो जाता है. इस धारा को असंवैधानिक करार दिया जाना चाहिए. एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि देश के दूसरे राज्यों में बार-बार सुनवाई टाल दी जाती है और सुनवाई टालने के कारण भी नहीं बताया जाता.

इसपर कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि बहुत से ऐसे राज्य है जहां अबतक एमपी/एमएलए कोर्ट गठित नही की गई है. विजय हंसारिया ने कोर्ट को सुझाव दिया है कि क्या चुनाव आयोग ऐसा नियम नहीं बना सकता कि राजनीतिक पार्टियों गंभीर अपराध में सजा पाए लोगों को पार्टी पदाधिकारी नहीं नियुक्त कर सकती. एमिकस क्यूरी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दोषी ठहराए जाने के लिए सांसद या विधायक के चुनाव लड़ने पर छह साल की रोक लगती है. छह साल बाद वो फिर से चुनाव लड़ सकता लिहाजा ये संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है.

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-भारत एक्सप्रेस 



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