Delhi High Court
राष्ट्रीय राजधानी में मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) प्रक्रिया में शिक्षको की ड्यूटी लगाए जाने के मामले में चुनाव आयोग से हलफनामे के जरिए जवाब मांगा है. कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए पूछा कि क्या चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 का सहारा लेकर अपनी मनमर्जी से जो चाहे वो कर सकता है?
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने सोशल ज्यूरिस्ट अशोक अग्रवाल और वकील राजेश कुमार गोगना की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है. कोर्ट 28 जुलाई को मामले में अगली सुनवाई करेगा. अदालत ने चुनाव आयोग से यह भी पूछा कि वह किस अधिकार के तहत स्कूल शिक्षकों को एसआईआर में काम करने का निर्देश दे रहा है.
दायर याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग उन शिक्षओं को दंडित कर सकता है, जो काम करने नहीं करते है. मामले की सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील संजय वशिष्ठ ने कहा कि दिल्ली में एसआईआर प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है और केवल 10-14% स्कूली शिक्षकों को ही मतदाता सूची संशोधन कार्यो में लगाया जाता है.
उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि कर्मचारियों को नियुक्त करने की चुनाव आयोग की शक्ति लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 13बी (2) से प्राप्त होती है और किसी भी असुविधा से बचने के लिए इस शक्ति का उदारतापूर्वक प्रयोग किया जाता है. कोर्ट ने कहा कि किसी को आपके मानदेय या मुआवजे में कोई दिलचस्पी नही है. कोर्ट ने पूछा कि क्या आपके द्वारा जारी किए गए इन निर्देशों को अनिवार्य कहा जा सकता है. क्या आप कह सकते हैं कि नही, नही, नही हम मुआवजे दे रहे है. कोर्ट ने कहा कि आप उनकी छुट्टी बर्बाद कर रहे है? क्या उन्हें आराम की जरूरत नही है?
चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने कहा कि शिक्षकों को केवल छुट्टियों और गैर-शिक्षण घंटो में काम करने की आवश्यकता होती है. अदालत ने पूछा कि शिक्षक किसी भी नियमित कर्मचारी की तरह अपनी छुट्टी का हकदार क्यों नही है? उन्हें छुट्टियों में बूथ लेबल की ड्यूटी में क्यों लगाया जाता है.
-भारत एक्सप्रेस
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