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राज्यपाल और राष्ट्रपति को समयसीमा में बांध नहीं सकते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने राष्ट्रपति और राज्यपाल को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. संविधान पीठ ने अपने फैसले में राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए बिल पर निर्णय के लिए समयसीमा तय नही किया जा सकता है.

Edited by Vaibhav Gupta

सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने राष्ट्रपति और राज्यपाल को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. संविधान पीठ ने अपने फैसले में राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए बिल पर निर्णय के लिए समयसीमा तय नहीं किया जा सकता है. संविधान पीठ में सीजेआई बी आर गवई के अलावे जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर ने यह फैसला सुनाया है.

बिल के निर्णय पर समयसीमा निश्चित नहीं

संविधान पीठ ने तमिलनाडू सरकार के मामले में दिए गए दो सदस्यीय पीठ के फैसले को असंवैधानिक करार दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए बिल पर निर्णय के लिए समयसीमा निश्चित नहीं की जा सकती. राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए संदर्भ में पूछा था कि क्या संवैधानिक न्यायालय राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समय सीमा निर्धारित कर सकता है.

संविधान पीठ ने 10 दिन तक चली सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था. राज्यपाल के पास तीन विकल्प हैं या तो मंजूरी दें, या बिलों के लिए दोबारा विचार के लिए भेजे या उन्हें राष्ट्रपति के पास भेजे. राज्यपाल विधेयक को कानून बनाने के बीच सिर्फ एक रबर स्टैम्प नहीं है.

राज्यपाल विधेयक को दे सकते है मंजूरी: कोर्ट

कोर्ट ने यह भी कहा है कि राज्यपाल की तरफ से फैसला लेने में देरी को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट बिल को अपनी तरफ से मंजूरी नहीं दे सकता. प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर अपनी राय देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200/201 के तहत कोर्ट बिल पर फैसला लेने के लिए राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा निर्धारित नहीं कर सकता है.

उन्होंने कहा कि विधेयक पर फैसला लेने के लिए उन्हें समय सीमा में बांधना संविधान की भावना के विपरीत होगा. कोर्ट ने यह भी कहा है कि अनुच्छेद 200 के तहत व्यवस्था है कि राज्यपाल विधेयक को मंजूरी दे सकते हैं, विधानसभा को दोबारा भेज सकते है या राष्ट्रपति को भेज सकते है, लेकिन अगर विधानसभा किसी बिल को वापस भेजे तो राज्यपाल को उसे मंजूरी देनी होगी.

हर मुद्दे का समाधान करने वाला हेडमास्टर नहीं

मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और राज्यपालों की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए विधेयक पर फैसला लेने के लिए तय किए गए समय का विरोध किया है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को संविधान की व्याख्या तक सीमित रहना चाहिए और यह राजनीतिक क्षेत्र के हर मुद्दे का समाधान करने वाला हेडमास्टर नहीं है.

महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश एसजी मेहता ने कहा कि सिर्फ राज्यपाल और राष्ट्रपति ही विधेयकों को मंजूरी दे सकता है. कोर्ट विधेयकों को मंजूरी नहीं दे सकता है. केंद्र सरकार ने अपने लिखित जवाब में कहा है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति का बिलों पर निर्णय लेना उच्च संवैधानिक दायित्व है और इसमें अदालतें सीधे दखल नहीं दे सकती है. अनुच्छेद 200 और 201 में राज्यपाल और राष्ट्रपति को बिल पर हस्ताक्षर करने, उसे रोकने या राष्ट्रपति के पास भेजने की चार विकल्प दिए गए हैं.

संविधान में समय-सीमा न होने का कारण

जवाब में यह भी कहा गया है कि संविधान ने जानबूझकर इसमें कोई समय-सीमा नहीं रखी है, ताकि वे पूरी संवैधानिक समीक्षा करके निर्णय ले सकें. वहीं, गोवा और पुड्डुचेरी सरकार द्वारा दायर लिखित जवाब में कहा गया है कि अनुच्छेद 142 (सुप्रीम कोर्ट को मिले विशेष शक्ति) का प्रयोग करके भी अदालतें राज्यपाल की जगह खुद बिल को स्वीकृत नहीं मान सकती.

राज्यों के तरफ से यह भी कहा गया है कि अदालत केवल यह घोषणा या अनुरोध कर सकती है कि राज्यपाल को बिल पर निर्णय यथाशीघ्र लेना चाहिए, लेकिन वह खुद राज्यपाल की भूमिका नहीं निभा सकती. जवाब में यह भी कहा गया है कि कोर्ट संविधान में संशोधन नहीं कर सकता या संविधान निर्माताओं की मंशा को विफल नहीं कर सकता. बशर्ते कि संविधान पीठ में ऐसी कोई प्रक्रियागत जनादेश न हो.

ये भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट प्रेसीडेंशियल रेफरेंस से संबंधित मामले में 20 नवंबर को सुनाएगा फैसला

-भारत एक्सप्रेस



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