सुप्रीम कोर्ट में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में ओबीसी वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण देने के मामले में मध्य प्रदेश सरकार को आड़े हाथ लिया है. कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की मांग पर सुनवाई को नवंबर के दूसरे सप्ताह तक के लिए टाल दिया है.
जानबूझकर टाली जा रही सुनवाई
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील वरुण ठाकुर ने सुनवाई टाले जाने पर आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा कि सरकार जानबूझकर कर सुनवाई को टाल रही है. पिछली सुनवाई में कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि 6 साल से सरकार क्या सो रही थी. कोर्ट दायर 90 याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है.
नियुक्ति न होने पर कार्यों में बाधा
पिछली सुनवाई में मध्य प्रदेश सरकार ने आरक्षण का समर्थन किया था. याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील वरुण ठाकुर ने कोर्ट को बताया था कि जिस प्रकार छत्तीसगढ़ में बढ़े हुए आरक्षण को लागू किया गया है. ठीक उसी तरह का मामला मध्य प्रदेश का भी है. उन्होंने कहा था कि मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों की नई नियुक्ति न हो पाने की वजह से सरकारी कार्यों में बाधा आ रही है.
दायर याचिका में कहा गया है कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा एमबीबीएस छात्रों को पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल प्रवेश परीक्षा के लिए दिए गए स्टे का हवाला देकर राज्य सरकार ओबीसी के बढ़े हुए कोटा का फायदा देने से इनकार कर रही है. यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील वरुण ठाकुर के माध्यम से दायर की गई है.
ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण
याचिका में मांग की गई है कि मध्य प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित और राष्ट्रपति की अनुमति के बाद अधिसूचित कानून को लागू करने की मांग की गई है. ओबीसी कोटा के तहत पिछड़े वर्गों के लिए 27 फीसदी आरक्षण देना है. मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग ( अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण) अधिनियम 1994 की धारा 4 (2) के तहत सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान हैं.
याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक फैसले को आधार बनाकर 27 फीसदी आरक्षण को लागू करने से इनकार कर दिया है.
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-भारत एक्सप्रेस
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