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अंतरिक्ष से पृथ्वी देखने का अनोखा अहसास, बुकर विजेता उपन्यास ‘ऑर्बिटल’ के हिंदी अनुवाद को मिला प्रतिष्ठित ‘वैली ऑफ वर्ड्स’ अवॉर्ड

समैंथा हार्वी के बुकर पुरस्कार विजेता उपन्यास ‘ऑर्बिटल’ के हिंदी अनुवाद को वैली ऑफ वर्ड्स बुक अवॉर्ड्स 2026 में सम्मान मिला है.

समैंथा हार्वी के चर्चित उपन्यास ‘ऑर्बिटल’ ने एक बार फिर साहित्य की दुनिया में अपनी जगह मजबूत की है. वैली ऑफ वर्ड्स (Valley of Words) बुक अवॉर्ड्स 2026 में इस किताब के हिंदी अनुवाद को अनुवाद श्रेणी का प्रतिष्ठित पुरस्कार दिया गया है. पेंगुइन स्वदेश से प्रकाशित इस हिंदी संस्करण का अनुवाद डॉ. रोहिणी ने किया है.

खास बात यह है कि ‘ऑर्बिटल’ को 2024 में बुकर पुरस्कार मिल चुका है. अब इसके हिंदी अनुवाद को सम्मान मिलने से यह किताब उन पाठकों तक भी पहुंच रही है, जो अंतरराष्ट्रीय साहित्य को हिंदी में पढ़ना पसंद करते हैं.

अंतरिक्ष में रहते हुए पृथ्वी को देखने की कहानी

‘ऑर्बिटल’ को समैंथा हार्वी का पांचवां उपन्यास माना जाता है. किताब की कहानी अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर मौजूद छह अंतरिक्ष यात्रियों के इर्द-गिर्द घूमती है. ये यात्री अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, इटली और जापान से हैं और अंतरिक्ष स्टेशन से लगातार पृथ्वी का चक्कर लगा रहे हैं.

ISS पर उनकी जिंदगी में वैज्ञानिक काम, मौसम से जुड़े आंकड़े जुटाना, प्रयोग और रोजमर्रा की शारीरिक जरूरतें शामिल हैं. लेकिन इस उपन्यास का असली केंद्र इनमें से कोई काम नहीं, बल्कि पृथ्वी को ऊपर से देखना है.

पृथ्वी की कक्षा में मौजूद अंतरिक्ष यात्रियों के लिए एक दिन का मतलब हमारे लिए सामान्य 24 घंटे जैसा नहीं है. वे लगभग हर 90 मिनट में सूर्योदय और सूर्यास्त देखते हैं. यानी एक दिन में पृथ्वी के करीब 16 चक्कर और उतने ही सूर्योदय-सूर्यास्त. इस असामान्य समय-अनुभव के जरिए हार्वी पाठक को समय और जिंदगी को एक अलग नजरिए से देखने का मौका देती हैं.

अगर आप अंतरिक्ष पर आधारित किसी तेज रफ्तार कहानी की उम्मीद कर रहे हैं, जिसमें एलियन, विस्फोट या कोई बड़ा तकनीकी संकट हो, तो ‘ऑर्बिटल’ उससे बिल्कुल अलग किताब है.

यहां कहानी की गति जानबूझकर धीमी है. हार्वी खुद इसे ‘स्पेस पास्टोरल’ कहती हैं. उपन्यास में अंतरिक्ष एक रोमांचक पृष्ठभूमि भर नहीं है, बल्कि वहां से पृथ्वी, इंसान और हमारे अस्तित्व को देखने का माध्यम बन जाता है.

ऊपर से देखने पर देशों की सीमाएं नजर नहीं आतीं. महाद्वीप एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं और पूरी पृथ्वी एक छोटी-सी दुनिया जैसी लगती है. यही अनुभव उपन्यास के सबसे महत्वपूर्ण विचारों में से एक है.

दूर जाकर भी इंसान से दूर नहीं होते

‘ऑर्बिटल’ की खासियत यह भी है कि अंतरिक्ष की विशाल दूरी के बीच किताब बेहद मानवीय बनी रहती है. अंतरिक्ष यात्रियों में से किसी को अपनी मां की मृत्यु की खबर मिलती है, तो किसी को अपने शरीर में एक गांठ महसूस होती है. ऐसे प्रसंग याद दिलाते हैं कि लाखों किलोमीटर दूर होने के बावजूद इंसान अपनी चिंताओं, रिश्तों और डर से मुक्त नहीं हो जाता.

उपन्यास जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई और समुद्र में उठने वाले बड़े तूफानों जैसे मुद्दों को भी ऊपर से देखने की कोशिश करता है. अंतरिक्ष से दिखाई देने वाली पृथ्वी खूबसूरत भी है और बेहद नाजुक भी.

भाषा ने बनाया किताब को खास

हार्वी की लेखन शैली काव्यात्मक होने के साथ-साथ काफी सटीक है. वह पृथ्वी को कभी किसी चमकीले पत्थर की तरह, कभी फल की तरह और कभी आंख की तरह देखने का अनुभव कराती हैं. उनकी भाषा पाठक को सिर्फ दृश्य नहीं दिखाती, बल्कि उस दृश्य के भीतर छिपी भावना तक ले जाती है.

ऐसी किताब का अनुवाद करना आसान काम नहीं है. डॉ. रोहिणी के हिंदी अनुवाद की खासियत यही है कि उन्होंने मूल रचना की संवेदनशीलता और लय को बनाए रखने की कोशिश की है. पुरस्कार मिलना इस बात का संकेत है कि हिंदी में ‘ऑर्बिटल’ का अनुभव प्रभावी ढंग से पाठकों तक पहुंचा है.

बुकर के बाद हिंदी में भी नई पहचान

2024 का बुकर पुरस्कार मिलने के बाद ‘ऑर्बिटल’ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खूब चर्चा में रही थी. यह अंतरिक्ष पर केंद्रित बुकर पुरस्कार जीतने वाली पहली किताब है और बुकर के इतिहास की सबसे छोटी विजेता कृतियों में भी इसकी गिनती होती है.

अब वैली ऑफ वर्ड्स का अनुवाद पुरस्कार मिलने से किताब की यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव सामने आया है. यह सम्मान सिर्फ एक किताब या उसके अनुवादक की उपलब्धि नहीं है, बल्कि हिंदी में विश्व साहित्य के बढ़ते दायरे को भी रेखांकित करता है.

‘ऑर्बिटल’ उन लोगों के लिए शायद सबसे दिलचस्प साबित होगी, जिन्हें ऐसी किताबें पसंद हैं जो कहानी के साथ-साथ उन्हें सोचने का मौका भी दें. यहां घटनाएं कम हैं, लेकिन विचार और भावनाएं काफी गहरी हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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