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Book Review

27 मार्च को दुनिया भर में विश्व रंगमंच दिवस मनाया जा रहा है. इस मौके पर राजकमल प्रकाशन से आई फैसल अलकाजी की किताब 'मंच प्रवेश' चर्चा के केंद्र में है.

अमर शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की 95वीं बरसी पर पंकज चतुर्वेदी की नई किताब ‘मेरे भगत सिंह’ चर्चा में है. यह किताब भगत सिंह को केवल एक क्रांतिकारी नायक के रूप में नहीं, बल्कि लाहौर के उस घर के एक लाडले बेटे और जेल की कोठरी में गहन दर्शन पर बहस करने वाले एक प्रखर विद्वान के रूप में पेश करती है.

आज बिहार अपना स्थापना दिवस मना रहा है. इस अवसर पर पेंगुइन स्वदेश द्वारा प्रकाशित अभय के. की पुस्तक "नालंदा: विश्व चेतना का उद्गम स्थल" के जरिए जानिए उस महान विश्वविद्यालय के उत्थान, पतन और फिर से जीवित होने की पूरी कहानी.

आज विश्व कविता दिवस पर याद करते हैं राजस्थान के उस जनकवि को, जिनकी पंक्तियों में रेगिस्तान की तपन भी है और संवेदना की ठंडी छांव भी. पेंगुइन स्वदेश द्वारा प्रकाशित कन्हैयालाल सेठिया के प्रतिनिधि संग्रह 'पंख दिए आकाश न दोगे' की विशेष समीक्षा, जो हमें स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की नई उड़ान सिखाती है.

महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव का 'स्पंदन' और क्वांटम फिजिक्स के 'वाइब्रेशन' में क्या संबंध है? डॉ. मृत्युंजय गुहा मजूमदार की नई पुस्तक 'शिव से श्रोडिंगर' प्राचीन कश्मीरी शैव दर्शन और आधुनिक विज्ञान के रहस्यों को एक साथ लाती है.

यतीन्द्र मिश्र की नई पुस्तक 'नैनन में आन-बान' शास्त्रीय संगीत की शुष्क व्याख्या नहीं, बल्कि सुरों की एक आत्मीय यात्रा है. यह किताब 12 महान संगीतकारों के जीवन और उनकी गायकी के जरिए पाठक को रागों की दुनिया से जोड़ती है.

विजय सिंह की पुस्तक "साठ पार के सुपरस्टार" रिटायरमेंट के बाद सक्रिय और सकारात्मक जीवन जीने का मंत्र देती है. अखबार बेचने से लेकर नेशनल सेल्स हेड तक का सफर तय करने वाले लेखक ने अपनी इस किताब में बताया है कि कैसे 60 के बाद की 'बोनस उम्र' को एक सुपरस्टार की तरह जिया जा सकता है.

‘देवव्रत- कालजयी योद्धा की वीरगाथा’ केवल महाभारत के एक महान पात्र की कथा नहीं, बल्कि त्याग, वचनबद्धता और चरित्र की ऐसी गूढ़ व्याख्या है, जो पाठक के अंतःकरण को छू जाती है. प्रभात सिन्हा द्वारा रचित यह कृति भीष्म पितामह को दैवी नहीं, बल्कि संवेदनशील मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करती है.

यह उपन्यास उन संकरी गलियों और 75 पैसे वाली चाय की खुशबू की वापसी है, जहाँ भविष्य गढ़ा जाता था. 'इलाहाबाद पैसेंजर' महज़ एक कहानी नहीं, बल्कि 1990 के दशक के इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उस दौर की जीवंत धड़कन है.

सिद्धार्थ मुखर्जी, पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखक और ऑन्कोलॉजिस्ट, अपनी किताबों से विज्ञान को आम पाठकों के लिए इतना रोचक बना देते हैं कि वह महज तथ्यों का संग्रह न रहकर एक भावनात्मक यात्रा लगने लगती है.