भारत को अक्सर उसकी विविधता के लिए जाना जाता है. यहां अलग-अलग भाषाएं हैं, अलग संस्कृतियां हैं, अलग खान-पान और अलग क्षेत्रीय पहचान हैं. लेकिन इस विविधता को एक देश की एकता के साथ जोड़कर रखना आसान काम नहीं था. आज हम जिस भारत के नक्शे को जानते हैं, वह आजादी के समय ऐसा बिल्कुल नहीं था. पिछले सात दशकों में देश की सीमाएं कई बार बदलीं, नए राज्य बने, पुराने राज्यों का बंटवारा हुआ और कई क्षेत्रों को नई पहचान मिली.
संजीव चोपड़ा की किताब हम भारत के राज्यों के लोग इसी दिलचस्प और कम चर्चा में रहने वाली कहानी को सामने लाती है. यह किताब उनकी अंग्रेजी पुस्तक We, the People of the States of Bharat: The Making and Remaking of India’s Internal Boundaries का हिंदी रूपांतरण है, जिसका अनुवाद सचिन चौहान ने किया है और इसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.
1947 में जब भारत आजाद हुआ, तब सामने सिर्फ सत्ता हस्तांतरण की चुनौती नहीं थी. देश के सामने एक ऐसा राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचा तैयार करने का सवाल भी था, जिसमें सैकड़ों रियासतों और अलग-अलग प्रांतों को एक साथ लाया जा सके.
उस समय भारत में 562 रियासतें और नौ प्रांत थे. सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन की कोशिशों से ज्यादातर रियासतों का भारत में विलय हुआ. लेकिन इसके बाद एक नई बहस शुरू हुई—राज्यों की सीमाएं किस आधार पर तय हों?
भाषा इस बहस का सबसे बड़ा मुद्दा बनकर सामने आई. कई इलाकों के लोग चाहते थे कि उनकी भाषा और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर अलग राज्य बनाया जाए. हालांकि शुरुआती दौर में केंद्र सरकार इस विचार को लेकर सहज नहीं थी.
जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और पट्टाभि सीतारमैया की जेवीपी कमेटी ने भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग को स्वीकार नहीं किया. उनका मानना था कि भाषा लोगों को जोड़ सकती है, लेकिन यही चीज क्षेत्रीय अलगाव को भी बढ़ावा दे सकती है.
इसके बाद 1948 में एस.के. धर आयोग ने प्रशासनिक सुविधा को आधार बनाकर राज्यों के पुनर्गठन की बात कही. लेकिन मांगें थमी नहींं. आखिरकार फजल अली आयोग का गठन हुआ और 1955 में उसकी रिपोर्ट आई. इसी प्रक्रिया के बाद 31 अगस्त 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित हुआ. यहीं से भारत के बदलते राजनीतिक नक्शे की एक लंबी कहानी शुरू होती है.
आंध्र से शुरू हुआ बड़ा बदलाव
भाषाई राज्यों की मांग को निर्णायक मोड़ देने वाली घटनाओं में आंध्र राज्य का गठन सबसे महत्वपूर्ण रहा. तेलुगू भाषी क्षेत्र के लिए पोट्टी श्रीरामुलु ने लंबी भूख हड़ताल की. उनकी मृत्यु के बाद आंदोलन ने जोर पकड़ा और आखिरकार आंध्र राज्य के गठन का रास्ता साफ हुआ.
इसके बाद यह संदेश पूरे देश में गया कि भाषा और क्षेत्रीय पहचान की मांग को हमेशा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया ने फिर एक नई गति पकड़ी.
हर राज्य की अपनी कहानी
किताब की खास बात यह है कि लेखक केवल बड़े फैसलों का जिक्र करके आगे नहीं बढ़ते. वे बताते हैं कि देश के लगभग हर राज्य की सीमा के पीछे कोई न कोई राजनीतिक संघर्ष, क्षेत्रीय मांग या प्रशासनिक वजह रही है.
पश्चिम बंगाल और बिहार को मिलाकर एक बड़ा राज्य बनाने का प्रस्ताव भी कभी सामने आया था. डॉ. बी.सी. रॉय और श्रीकृष्ण सिन्हा से जुड़ा यह रॉय-सिन्हा प्रस्ताव चर्चा में आया और उसे केंद्र तथा दोनों राज्यों की विधानसभाओं से समर्थन भी मिला. इसके बावजूद यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी.
पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश का गठन भी भाषा, धर्म और क्षेत्रीय पहचान के जटिल समीकरणों से जुड़ा रहा. इन राज्यों की कहानी बताती है कि भारत में सीमा तय करना सिर्फ नक्शे पर एक रेखा खींच देने जैसा काम नहीं था.
उत्तर-पूर्व में बदला पूरा राजनीतिक नक्शा
उत्तर-पूर्व भारत की कहानी तो और भी ज्यादा दिलचस्प है. कभी असम का हिस्सा रहे कई क्षेत्रों ने अलग राजनीतिक पहचान की मांग उठाई. समय के साथ नागालैंड, मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों का निर्माण हुआ.
इन बदलावों के पीछे केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं थी. स्थानीय पहचान, जनजातीय आकांक्षाएं, राजनीतिक आंदोलन और केंद्र के साथ बातचीत—इन सभी ने भूमिका निभाई.
इसी तरह गोवा और सिक्किम का भारत में शामिल होना तथा फ्रांसीसी क्षेत्रों का विलय भी देश के राजनीतिक भूगोल को बदलने वाली महत्वपूर्ण घटनाएं थीं.
साल 2000 के बाद फिर बने नए राज्य
भारत के नक्शे में बदलाव 1956 के बाद रुक नहीं गया. साल 2000 में झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड तीन नए राज्यों के रूप में सामने आए.
इन राज्यों के निर्माण के पीछे अलग-अलग क्षेत्रीय और सामाजिक कारण थे. कहीं आदिवासी पहचान प्रमुख थी, कहीं लंबे समय से अलग प्रशासन की मांग उठ रही थी और कहीं पहाड़ी क्षेत्र की विशिष्ट जरूरतों को आधार बनाया गया.
तेलंगाना की कहानी भी इसी लंबी प्रक्रिया का हिस्सा है. 1956 के जेंटलमैन एग्रीमेंट से लेकर 2014 में तेलंगाना के अलग राज्य बनने तक करीब छह दशक का राजनीतिक सफर रहा. इस दौरान क्षेत्रीय असंतोष, आंदोलनों और राजनीतिक बातचीत ने लगातार भूमिका निभाई.
राजधानी भी बनी राजनीति का बड़ा मुद्दा
राज्यों के बंटवारे और पुनर्गठन में सिर्फ सीमा ही विवाद का विषय नहीं रही. राजधानी का सवाल भी कई बार बेहद पेचीदा साबित हुआ.
मद्रास यानी आज के चेन्नई को लेकर विवाद हो, चंडीगढ़ का सवाल हो या हैदराबाद की स्थिति—राजधानी तय करना कई बार राज्य की सीमा तय करने जितना ही कठिन रहा.
किताब नक्शों के जरिए भी इन बदलावों को समझाती है. तिब्बत का नक्शों से गायब होना और फिर अलग संदर्भों में उसका दिखाई देना, साथ ही हिंदी नक्शों का राजनीतिक महत्व, यह दिखाता है कि नक्शे सिर्फ भौगोलिक जानकारी देने वाले दस्तावेज नहीं होते. वे राजनीति और पहचान का हिस्सा भी बन सकते हैं.
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख तक पहुंचती है कहानी
किताब का आखिरी बड़ा पड़ाव 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन तक जाता है. इस बदलाव के साथ जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अलग-अलग केंद्रशासित प्रदेशों के रूप में पुनर्गठित किया गया.
इस तरह आजादी के शुरुआती वर्षों में शुरू हुई राज्यों और सीमाओं की कहानी 2019 तक पहुंचती है. इस पूरे सफर में भारत का नक्शा कई बार बदला, लेकिन देश की एकता बनी रही.
संजीव चोपड़ा पूर्व आईएएस अधिकारी और लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के पूर्व निदेशक रहे हैं. किताब की खासियत उसका शोध भी है. इसके लिए सरकारी दस्तावेजों, राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्टों और विदेश एवं राष्ट्रमंडल कार्यालय के अभिलेखों जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है. लेखक के व्यक्तिगत अनुभव भी इस अध्ययन को एक अलग दृष्टि देते हैं.
चोपड़ा का मूल तर्क यह है कि राज्यों का पुनर्गठन भारत के लिए कमजोरी का संकेत नहीं था. इसके उलट, क्षेत्रीय मांगों को लोकतांत्रिक तरीके से जगह देना देश की संघीय व्यवस्था को मजबूत करने का जरिया बना.
यानी अलग राज्य की मांग उठना अपने-आप में देश से अलग होने की मांग नहीं है. कई मामलों में स्थानीय पहचान को राजनीतिक और प्रशासनिक मान्यता देकर ही व्यापक राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया गया.
आज भी क्यों जरूरी है यह किताब?
इस किताब की प्रासंगिकता सिर्फ इतिहास समझने तक सीमित नहीं है. आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों में नए राज्यों की मांग समय-समय पर उठती रहती है. विदर्भ, बोडोलैंड और गोरखालैंड जैसे मुद्दे इसका उदाहरण हैं. दूसरी ओर जनगणना और परिसीमन जैसे विषय भी राज्यों की राजनीति और प्रतिनिधित्व से जुड़े हुए हैं.
ऐसे समय में यह समझना जरूरी है कि भारत की आंतरिक सीमाएं हमेशा से स्थिर नहीं रही हैं. वे लोगों की मांगों, राजनीतिक समझौतों, आंदोलनों और बदलती परिस्थितियों के साथ बदलती रही हैं.
यही इस किताब की सबसे बड़ी खासियत है. यह भारत के नक्शे को सिर्फ जिलों और राज्यों की सीमाओं के रूप में नहीं देखती, बल्कि उन सीमाओं के पीछे मौजूद लोगों की आकांक्षाओं और राजनीति को भी समझने की कोशिश करती है.
हम भारत के राज्यों के लोग इसलिए महज इतिहास की किताब नहीं रह जाती. यह बताती है कि भारत जैसा विशाल और विविध देश खुद को कैसे लगातार नए सिरे से व्यवस्थित करता रहा है. नक्शा बदला, राज्य बदले, राजधानियां बदलीं और राजनीतिक समीकरण भी बदले लेकिन हर बदलाव के बीच एक चीज लगातार बनी रही, वह थी एक साथ रहने की कोशिश.
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-भारत एक्सप्रेस
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