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‘नेताओ को ब्रेकफास्ट में खाने वाला…’, ज्ञानेश कुमार के दौर में क्यों हो रही है टी.एन. शेषन की चर्चा? जानिए क्या थी उनकी कहानी

चुनाव आयोग की निष्पक्षता और भूमिका को लेकर जारी बहस के बीच पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन एक बार फिर चर्चा में हैं. 1990 से 1996 तक अपने कार्यकाल में शेषन ने चुनावी नियमों के सख्त पालन, बूथ कैप्चरिंग पर नियंत्रण और प्रशासनिक जवाबदेही पर जोर दिया था.

जब भी देश में चुनाव आयोग की भूमिका, उसकी निष्पक्षता और चुनावी व्यवस्था को लेकर बहस तेज होती है, तब टी.एन. शेषन का नाम अक्सर चर्चा में आ जाता है. 1990 के दशक में मुख्य चुनाव आयुक्त रहे शेषन ने अपने कार्यकाल में चुनावों से जुड़े नियमों को सख्ती से लागू करने पर खास जोर दिया था. उनके काम करने का अंदाज इतना स्पष्ट और बेबाक था कि वह दौर आज भी भारतीय चुनावी इतिहास में अलग पहचान रखता है.

शेषन ने ऐसे समय में चुनाव आयोग की कमान संभाली थी, जब कई जगहों पर चुनाव के दौरान बूथ कैप्चरिंग, हिंसा और मतपेटियों की लूट जैसी घटनाएं बड़ी चुनौती बनी हुई थीं. खास तौर पर बिहार जैसे राज्यों में चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली ऐसी घटनाओं की चर्चा आम थी. प्रशासन और पुलिस के सामने भी इन्हें रोकना आसान नहीं था.

ऐसे माहौल में शेषन ने चुनावी नियमों को कागज तक सीमित रखने के बजाय उन्हें जमीन पर लागू करने की कोशिश की. बूथों पर सुरक्षा, चुनावी आचार और अधिकारियों की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर उन्होंने सख्त रुख अपनाया. उनके कार्यकाल में चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर सार्वजनिक चर्चा भी काफी बढ़ी.

नियमों पर समझौता नहीं

टी.एन. शेषन 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे. प्रशासनिक सेवा के लंबे अनुभव के साथ वे अपने स्पष्ट और अनुशासनप्रिय रवैये के लिए जाने जाते थे. सरकारों और राजनीतिक दलों के साथ उनके मतभेद भी कई बार सामने आए, लेकिन उनका जोर इस बात पर रहता था कि चुनाव आयोग को कानून में दिए गए अधिकारों और नियमों के मुताबिक काम करना चाहिए.

उनका नजरिया सीधा था कि कानून पसंद नहीं है तो उसे बदलने का रास्ता राजनीतिक व्यवस्था के पास है, लेकिन जब तक कोई नियम लागू है, चुनावी प्रक्रिया में उसका पालन होना चाहिए. इसी सोच के चलते वे चुनाव से जुड़े मामलों में किसी तरह के दबाव के बजाय नियमों को प्राथमिकता देने की बात करते थे.

शेषन समय की पाबंदी और काम के प्रति गंभीरता के लिए भी चर्चित थे. उनका मानना था कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति को अपने कर्तव्य का निर्वहन ईमानदारी और अंतरात्मा के साथ करना चाहिए. मुश्किल परिस्थितियां जिम्मेदारी से पीछे हटने का कारण नहीं बननी चाहिए. यह उनके सार्वजनिक जीवन से जुड़ी प्रमुख धारणाओं में रही.

शेषन का कार्यकाल 1996 में खत्म हुआ, लेकिन चुनावी व्यवस्था पर उनकी छाप लंबे समय तक चर्चा में रही. 2019 में 86 वर्ष की उम्र में उनके निधन के बाद भी विभिन्न नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें एक उत्कृष्ट सिविल सर्वेंट बताते हुए कहा था कि उन्होंने पूरी लगन और ईमानदारी से देश की सेवा की और उनके प्रयासों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूती मिली.

आज, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सार्वजनिक और राजनीतिक बहस चल रही है, तब कुछ लोग मौजूदा परिस्थितियों की तुलना शेषन के दौर से कर रहे हैं. यह तुलना अपने आप में एक राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा है. शेषन को याद करने वालों के लिए उनका कार्यकाल चुनाव आयोग की संस्थागत भूमिका, नियमों के कड़ाई से पालन और चुनावी प्रक्रिया में प्रशासनिक सख्ती की एक मिसाल है.

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-भारत एक्सप्रेस



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