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West Bengal Political Analysis: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बदलाव का सिलसिला कई चुनावों से चल रहा था, लेकिन तृणमूल कांग्रेस (TMC) उसे पढ़ने में नाकाम रही. नतीजा यह हुआ कि हालिया चुनावी आंकड़ों में भाजपा ने टीएमसी के वोट-बैंक में सेंध लगाई और राज्य की सत्ता की दौड़ में और मजबूत स्थिति बना ली.
2014 से शुरू हुआ संकेत
2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उदय के साथ ही भाजपा का प्रदर्शन उछल पड़ा. 2009 में मात्र 6 प्रतिशत वोट शेयर वाले भाजपा ने 2014 में 17 प्रतिशत वोट हासिल कर लिए. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह फासला और कम हो गया- टीएमसी और भाजपा के बीच अंतर सिर्फ 3 प्रतिशत रह गया.
2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 38 प्रतिशत वोट हासिल किए. यह आंकड़ा साफ संकेत दे रहा था कि भाजपा अब राज्य में सत्ता का दावेदार बन चुकी है. ध्यान देने वाली बात यह है कि इस उछाल के दौरान कोई SIR या अतिरिक्त फॉर्मूला काम नहीं कर रहा था. भाजपा ने शुद्ध संगठन, जन-संपर्क और विकल्प के रूप में अपनी छवि बनाकर वोट बढ़ाए.
वोट-आधार में चार गुना उछाल
2016 से 2021 के बीच अगर कोई पार्टी अपने वोट-आधार को लगभग चार गुना बढ़ा ले तो विपक्षी दल के लिए यह खतरे की घंटी होनी चाहिए थी. टीएमसी को अपने जनाधार के खिसकने के कारण तलाशने चाहिए थे, चाहे वह स्थानीय स्तर पर असंतोष हो, भ्रष्टाचार की छवि हो, या परिवारवाद और तुष्टिकरण की नीतियां. लेकिन टीएमसी इन संकेतों को नजरअंदाज करती रही.
ताजा चुनावी आंकड़े
दरअसल, टीएमसी के मतदाता ही भाजपा की ओर खिसक रहे हैं. क्रॉस-चेक और बैकवर्ड प्रोजेक्शन विधि से यह आसानी से समझा जा सकता है. पिछले दो विधानसभा और एक लोकसभा चुनावों का विश्लेषण बताता है कि कुल मतदान का लगभग 85-86 प्रतिशत वोट टीएमसी और भाजपा के बीच ही बंट रहा है. कांग्रेस, वामपंथी दलों और अन्य छोटी पार्टियों के पास मात्र 14-15 प्रतिशत वोट सीमित रह गए हैं.
इस बार के चुनाव में टीएमसी के वोट शेयर में 7.2 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि भाजपा के वोट में 7.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. सबसे अहम बात यह है कि अन्य दलों के खाते में इस बार भी लगभग 13.3 प्रतिशत वोट ही गए. यानी टीएमसी के खोए वोट सीधे भाजपा के पास गए. टीएमसी अपने वोटरों को रोकने में पूरी तरह नाकाम रही.
क्या थी वो इबारत?
दीवार पर लिखी इबारत साफ थी- बंगाल के मतदाता विकल्प चाहते थे. टीएमसी ने इसे पढ़ने की बजाय पुरानी तुष्टिकरण की राजनीति और संगठनात्मक ढिलाई पर भरोसा किया. नतीजा यह हुआ कि भाजपा न सिर्फ मजबूत हुई बल्कि टीएमसी के पारंपरिक वोट-बैंक में सेंध लगाने में सफल भी रही.
अब सवाल यह है कि टीएमसी अगले चुनावों में इन गलतियों से सबक लेती है या फिर दीवार पर लिखी इबारत को फिर नजरअंदाज कर देती है. बंगाल की राजनीति में बदलाव तेजी से हो रहा है और पुरानी ताकतों को अब नई हकीकत स्वीकार करनी होगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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