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विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार




भारत एक्सप्रेस


आज दूरदर्शन की प्रतिष्ठित और लोकप्रिय न्यूज एंकर सरला माहेश्वरी ने 71 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली.

महान उद्योगपति जमनालाल बजाज ने व्यापार को गांधीवादी ट्रस्टीशिप से जोड़कर राष्ट्रसेवा का नया मॉडल दिया. अस्पृश्यता उन्मूलन, खादी और स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान आज भी प्रेरणा देता है.

यतीन्द्र मिश्र की नई पुस्तक 'नैनन में आन-बान' शास्त्रीय संगीत की शुष्क व्याख्या नहीं, बल्कि सुरों की एक आत्मीय यात्रा है. यह किताब 12 महान संगीतकारों के जीवन और उनकी गायकी के जरिए पाठक को रागों की दुनिया से जोड़ती है.

चौरी चौरा कांड की 104वीं वर्षगांठ पर यह घटना फिर याद दिलाती है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसा और जनाक्रोश के बीच संतुलन कितना जटिल था. 1922 की इस घटना ने ना सिर्फ असहयोग आंदोलन को रोका, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा और बहस को हमेशा के लिए बदल दिया.

क्या आप जानते हैं कि भारत में यूरोपीय गुलामी की नींव एक 'मसाला युद्ध' से पड़ी थी? 3 फरवरी 1509 को दीव के तट पर लड़ी गई वह नौसैनिक जंग, जहाँ काली मिर्च और लौंग के व्यापार पर कब्जे के लिए दुनिया की महाशक्तियां आपस में भिड़ गई थीं.

बिहार के मुजफ्फरपुर से निकलकर कृषि विज्ञान में क्रांति लाने वाले डॉ. गोपालजी त्रिवेदी को 2026 के पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. लीची की खेती के पुनर्जीवन से लेकर मखाना की वैज्ञानिक पैदावार तक, उनके नवाचारों ने लाखों किसानों की किस्मत बदली और बिहार की कृषि को वैश्विक पहचान दिलाई.

भारतीय तटरक्षक बल अपने स्थापना दिवस पर स्वर्ण जयंती वर्ष मना रहा है. 1976 में सीमित संसाधनों से शुरू हुआ यह बल आज समुद्री सुरक्षा, जीवन रक्षा अभियानों और राष्ट्र की समुद्री सीमाओं की रक्षा में एक मजबूत स्तंभ बन चुका है. पांच दशकों में आईसीजी ने साहस, सेवा और आधुनिकता की नई मिसाल कायम की है.

केरल ने देश में पहली बार वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग से Elderly Budget पेश कर इतिहास रच दिया है. 2026-27 के बजट में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए Silver Economy और Care Economy को विकास की धुरी बनाया गया है.

अफ्रीका में चीन की बढ़ती बंदरगाह मौजूदगी ने ‘डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी’ की बहस तेज कर दी है. निवेश, कर्ज और रणनीतिक नियंत्रण के बीच संप्रभुता पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

30 जनवरी को शहीद दिवस पर रखा जाने वाला दो मिनट का मौन सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि आज़ादी के लिए बलिदान देने वाले शहीदों को सामूहिक श्रद्धांजलि है. जानिए कैसे फील्ड मार्शल के.एम. कारियप्पा के सुझाव और पंडित नेहरू की पहल से इस राष्ट्रीय परंपरा की शुरुआत हुई.